कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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यंगल १०—यहि जग को न आपन का संग बोले हो । जस तरवर मैदान अकेलै ढोले हो ॥ चारि पवन झख झोरै कोड न सहायक हो । जस पुरइन पर नीर थीर नहि पायक हो ॥ मन तारै मन बोरै मनहि नचावै हो । मन आवै मन जाय नाम सब गावै हो ॥ विष बोयउ संसार अमृत कहाँ पावौ हो । पुनिरपि जनम तुम्हार दोष केहि लावौ हो ॥ मायाके विस्तार नींद नहि आवै हो । कहैं राजा कहैं रंक दोऊ मिलि रोवै हो ॥ कहै कवीर सुन संतो मन निरवारो हो । बूझहु करहु विचार बहुरि नहि आवो हो ॥
सत्यनाम ।
अथ तीसा यंत्र प्रारम्भः । *
बन्दी छोर कवीर गुरु, धर्मदास शिष जासु ।
तासु चरण बन्दन किये, होय अविद्या नासु ॥
इन्दव छन्द—सोय रह्यो नित मोह निसा महैं, जानि परो नहिं राम पियारो । जन्म अनेक गये सपनांतर, एकहु बार न जागृत
- यह तीसा यंत्र किसी निषेध बिचारवान् महात्माने परोपकारार्थ प्रकट किया है । इसमें निषेध सुन्दर विचार और उपदेश होनेके कारण, तथा सद्गुरु कवीरका श्री, प्रायः साखियाँ इसमें आनेके कारण कवीर पंथियोंको अत्यन्त प्रिय होनेसे, शब्दावलीके संग्रह करनेवालोंने इसे भी, अपनी शब्दावलीमें सम्मिलितकर लिया है । हस्तलिखित या छपी जितनी प्रति मिली सबमें—इसका नाम तो तीसाही यन्त्र लिखा है, किन्तु गिनतीके उपदेशी प्रश्नोत्तर के बल अटुठाइस हो लिखे हैं, इस लिये उसकी वृत्तिके लिये अन्तके दो प्रश्नोत्तर शामिलकर तीस पूरे कर दिये गये हैं, आशा है कि, मेरी इस सभ्य घृष्टताको शिक्षगण क्षमा करेंगे ।
इसकी एक प्रति, दिल्ली खारीबावलीके श्रीमहंत मुखलालदासजी साहबने बहुत दिन हुए भुसे दो थी जिसका नाम तीसा यंत्र न होकर शिक्षा दर्पन लिखा है । इसको किसी शैब संन्यासी महात्माने अपना करके छपवाया है । कवीरपंथियोंके पास जो प्रतियाँ हैं, उसमें मतभेदांतरसे रहित उपदेश मात्र है किन्तु शैब महात्माने इस यंत्रको शैब बनानेके लिये बीच बीचमें अपने अनुकूल कई दोहे मिलाकर यंत्रको अपना बनानेका प्रयत्न किया है । इस प्रकार के कार्य अनुचित होनेपर भी साम्प्रदायिकताके कारण लोगोंसे भूल हुआ ही करती है । इसी लिये सद्गुरुने कहा है—