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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७६१)

टुक हंस दे टुक रोय ॥ माता हस्ती झूलदो हो, आहूँ पहर खुसाल । चेला दास कवीरदा, पद गावे कमाल ॥

राग काफी १६-गलताना मता जब आवैगा, तब जीवड़ा सुख पावैगा ॥ टे० ॥ अचार विचार छुटे या जिवका, डुरमति दूर नसावैगा ॥ माया मोह भरमके बादल, परदा खोलि बहावैगा ॥ पांच पचीस करो बसि अपने, सतगुरु सबद लखावैगा ॥ रहनि गहनिकी नाव सवारी, तब भव पार सिधावैगा ॥ हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे, साहिबका गुन गावैगा ॥ अमरलोक इम्रतकी काया, तहाँ बड़ा सुख पावैगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, यह तत विरला पावैगा ॥

अथ मंगल प्रारम्भः ।

मंगल १-तन मन सुरति विचारि तो बात जनाइये । तुम प्रभु दीन दयाल सो ब्याह रचाइये ॥ वेद बुधि करि विधिसों चौक गुराइये । विषम भरम सब मेटिकै कलश धराइये ॥ त्रिकुटी छाजै बैठि नगर खलबल परी । गावत मंगल चार लगन हाथै धरी ॥ काम क्रोध दोउ काटिके खम्भ बनाइये । सत्सुकृतके बाँसन मंडप छाइये ॥ सुरतिको घुडिला पलानि चित चाबुक लियो । अनहद बाजो बजायके ब्याहन चढि चल्यो ॥ शीलको खड़ग बँधाय छिमाको मौरिया । चले अमर पुर जाय धनीकी पौरिया ॥ ब्याहै सदगुरु आप सवारे हेतियो ॥ कहै कवीर सतिभाय अमर घर चेतियो ॥

मंगल २-दीननके हो दयाल भगतिकी पन करौ । सरन आयकी लाज गई साहिब जिनि करो ॥ नऊ द्वार बिकार थार नौका वगे । मेरी सुरति नहीं ठहराय लगन केमे लगे ॥ पांच तत गुना तीनका सावर साजीया । जम राखे बिलमाय तो फंदन फादिया ॥ त्रिगुन