कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
भोरे, सेवा करन आक की आयो॥ मारी चोंच जब हूओ उडायो, छीर शरीर अंग लपटायो ॥ रातो फूल देखि सेमलको सुवना, अंत वासों नेह लगायो ॥ मारी चोंच फल गयौ दूटि जब, उडि गयो तूर तिवारो आयो॥ उडि न सकै बहु परचो झोलमें, तातै नाम किर जुवो कहायो॥ कहै कवीर नीचकी संगति, जाति गई औ जनम गवाँयो ॥
राग कान्हडा २५—नाम विना धिक धिक नर नारी । कहाँ ते आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वो रसना धिग वो कामा । चीन्हो नाहीं आतम रामा ॥ जा कुल पुत्र न भक्ति विचारी । जनमत क्यों न मरी महतारी॥ भरम सुचे सुच रही क्यों न बंझा । सुकरी रूप फिरै जग मंझा ॥ विधवा नारी करत सिंगारा । शोभा न पावे बिन भरतारा॥ वेश्याके पुत्र पिता कासो कहै । बिन गुर चेला ग्यान कैसे लहै ॥ राज बिना कैसी रजपूता । ग्यान बिना फोकट अवधूता ॥ जा कुल नाही हरिको दासा । सो कुल जानो ठाक पलासा ॥ कहैं कवीर भक्ति निज सारा । जो चीन्है सो उतरे पारा ॥
अथ राग काफी प्रारम्भः ।
राग काफी १—मैं तेरा दीदार हो दीदार दिवाना । घडी घडी तुझे देखा चाहों, सुनु साहेब रहमाना ॥ टे० ॥ पडा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यू घरका बंदी जादा ॥ नेकी कुलाह लिये सिर ऊपर, गलै प्रेमका धागा ॥ हुआ अलमस्त खबरि नहीं तनकी, पिया जो प्रेम पियाला ॥ ठाढे होय करि झुकि झुकि परते, तैरे रंग मतवाला ॥ तसबी और निमाज न जावूँ, ना धरि जानौ रोजा ॥ बंग जिकिरि जबहीसँ विसरायो, जबते तन मन खोजा ॥ कहैं कवीर कजा