कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(७५५)
गगना, अंतहि गगना भाई॥ कहै कवीर करम काहे लागै, झूठौ सकल उपाई ॥
राग कान्हडा २१-ताहि विचारो पंडित लोई । जाके रूप बरन नहीं होई ॥ टेक ॥ पिंडमें प्रान कहाँ तैं आवै, सुवा जीव कहु कहाँ समावै ॥ इंद्री कहाँ करै विसरामा । सोँ कित गया जो कहता रामा ॥ पांच तत्त्व जहाँ सबद न स्वादा । अलख निरंजन विधी न वादा ॥ कहैं कवीर मन मनहि समाना । अगम निगम झूठ करि जाना ॥
राग कान्हडा २२-मन मेरा पंछी विलमत हीरारे । गुरुका सबद एक अजर अमर है, धूप छाँह दुख डुंद नहींरे ॥ टेक ॥ अमर लोक हंसनका वासा, सुख सागर सुख लेत तहीरे ॥ तहँके गण बहुरि नहीं आवै, करत अनंद दुख डुंद नहींरे ॥ कपटकी पांघ द्वारि निरवारो, जो ले उडत विकार महीरे ॥ सुरतिकी चाँच संवारि सबैरे, नाम चुगै चुग रहु ढिगहीरे ॥ निरमल नाम जपौ हिरदामैं, बार बार मैं तोहि कहीरे ॥ आवागमन मिटै तब तेरो, बहुरि न या जग जनम लहीरे ॥ सदा आनंद होत है वा घर, कबहुँ न होत उदास वहीरे ॥ कहैं कवीर जहाँ अधिक जाल नहीं, गुर मारग चलि जाय तहीरे ॥
राग कान्हडा २३-हरिजन हंस दिसा लिय डोलै । निरमल नाम चुनि चुनि बोले ॥ टे० ॥ मान सरोवर तटके बासी । राम चरन रति आन उदासी ॥ सुकताहल बिन चोंच न लावै । मौन रहे कै हरिगुन गावै ॥ कौआ कुबुधि निकट नहि आवै । सो हंसा निज दर्शन पावै ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा । नीर पीरका करै निवेरा ॥
राग कान्हडा २४-धोषैही धोषै डहकायो । समुझ न परी सनद सतगुरकी, बहु फंदनमें आय फदायो ॥ टे० ॥ सुवना एक अंबके