कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 768, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७५४)
कवीरपंथी—
भांडा, एकहि सिरजन हारा ॥ जैसे बढई काठहिं काटै, अगिन न काटै कोई । ऐसे व्यापक है सबहिनमें, रवि स्वरूप है सोई ॥ माया मोह करि जगत भुलाना, गरंथ देखि गरवाना ॥ होय निःशंक शंक नहिं व्यापै, कहैं कवीर दिवाना ॥
राग कान्हडा १९—अब मैं पायो ब्रह्म ग्यान । सहज समाधी मुखमें रहिबो, कोटि कलप विसरान ॥ टे० ॥ गुरु कृपाल कृपा जब कीन्हा, हृदया कमल बिगासा ॥ भागा भरम दसों दिसि सूझा, परम ज्योति परगासा ॥ मृतक उठी धनुष कर लीन्हा, काल अहेरी भागा ॥ उदसिया सूर निसि किया प्याना, सोवतते तब जागा ॥ अविगत अकल अनुपम देखा, कहता कहो न जाई ॥ सेन करै मनही मन राखे, गुंगे जान मिठाई ॥ पुहुप बिना एक तरुवर फलिया, बिन कर तूर बजाया ॥ नारी विना नीर घट भरिया, सहज रूपसो पाया ॥ देखत काँच भया मन कंचन, बिन बानी मन माना ॥ उडा विहंगम खोज न पाया, ज्यों जल जलहि समाना ॥ पूजो देव बहुरि नहिं पूजूं, नहाय उदक न नहाऊं ॥ भाग्या भरम एकहि कहता, आप बहुरि नहिं आऊं ॥ आपामें जब आप निरखिया, आपनमें आपहिं सूझा ॥ आपहिं कहत सुनत पुनि आपै, आपनमहिं आपा बूझा ॥ अपने परिचय लागी तारी, आपनमें आप समाना ॥ कहैं कवीर जे आप विचारे, मिटिगा आवन जाना ॥
राग कान्हडा २०—कौन मरे जन्मे को आई । सुरग नरक कौन गति पाई ॥ टेक ॥ पांच तत्त्व अविगत तैं उपजा, ये कै किया निवासा ॥ विछुरा तत्त्व फिर ततैं समाना, रेषहिं रही न आसा ॥ जलमें कुंभ कुंभमें जल है, बाहर भीतर पानी ॥ बिनसा कुंभ जल जलहि समाना, यह तत कथै सु ग्यानी ॥ आदे गगना मधे