कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पशुवा, साम अर्थवन सोई ॥ सुसम वेदको भरम न जाने, कैसे ब्राह्मन होई ॥ कहैं कवीर निज ब्रह्मही चीन्हो, पास जनेऊ सोई । पाखंडकी गति सबही छूटे, तब निज ब्राह्मन होई ॥
गौरी ३९-पंडित अपनी अगिन बुझावो । हम तो अपनी राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो ॥ टे० ॥ को तुम कौन कहाँ से आये, अंत कहाँ तुम जाई । यहाँ तो तुम ब्रह्मन होइ बैठे, चौरासी बिसराई ॥ दशों मास औघें सुख रहिया, सप्त धातु रस पीया ॥ जहाँ तो तुम चौका करि जीमो, वहाँ चौका किन दीया ॥ ना मैं चीन्ह हारि मत चालो, अनंत अनूप उखाडो ॥ कोध चंडाल सदा संग व्यापे, ताको मूल उखाडो ॥ कुल अभिमाना आनकी पूजा, यहाँ विथा तोहि लागी । जो यह जाति बड़ी है पांडे, सुखदेवने क्यों त्यागी ॥ पांच तत्त्वको सकल पसारा, जहवाँ जीव दुख पावे ॥ कहैं कवीर सोई सत ब्राह्मन, उलटा ब्रह्म समावे ॥
गौरी ४०-पांडे बूझि पियो जल पानी, तोही छूति कहाँ लपटानी ॥ टेक ॥ जल सूतक थलभी सूतक, सूतक पवन रसोई ॥ जनम मरण दोऊ भी सूतक, सूचि कहाँते होई ॥ नहाय धोयके चौके बैठा, बहुत करी सुथराई ॥ उडि माखी चौकेमें बैठी, बूडि गई चतुराई ॥ मक्खी एक अखज भखि आयी, हसती ऊँट अरु घोडा ॥ उडि माखी पनवारे बैठी, ताको करो निबेडा ॥ पीर मुये पैगम्बर गाडे, सहस अठासी पांडे ॥ जलि बलि राख भये धरनीपर, उस माटीके भांडे ॥ पाँचो कपडा एक सूतका, जुलहे एक बनाया । कपडा लेकर अलगे राखो, धोती चौके लाया ॥ हाड़ झरे झर चाम झरेझर, दूध वहाँ सो आया ॥ सोई दूध तुम पीवन लागे, चपिया छूत लगाया ॥ नदी एक जो जल बहिआया,