कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(६९८)
कवीरपंथी—
नयन कज्जल मसि लाय । बीच बीच बिरहा लिख भेजो, दुख सुख लिखो न जाय ॥ सतगुरु आये कंठ लगाये, मिट गइ तपन हमार । गुरु प्रताप ताप गई तनकी, धर्मनि कहें पुकार ॥
होरी ४२—मैं तो आन परी चोरनके नगर, सतसंग बिना जिव तरसे ॥ टेक ॥ हाथके हीरा डार दियो, का सूठी भरी कंकरसे । होरी खेलनकी यही बेर है, फिर चौरासी मंदिलसे ॥ अपने पिया संग होरी खेलों, और न काहू मनसे ॥ कहैं कवीर यह मोहिं लखाया, क्या छोड़ चले हो फिरसे ॥
होरी ४३—मैं तो अब कैसे खेलोंगी होरी, मोहि लागी शब्दकी डोरी ॥ टेक ॥ या होरीका सकल पसारा, लोग कहे थोरी थोरी ॥ होरी खेलो जो अपने पिया संग, या होरी मेरे अंग बयोरी । निश्चि दिन खेलों अपने पिया संग, दूटत नाहिं न डोरी ॥ धर्मदास सतगुरु सों माते, साहेब कवीर भ्रम तोरी ॥
होरी ४४—गुरु लाये मुक्तिके पान, प्रीतम आये हो ॥ टेक ॥ पान परवाना देत जीवनको, वे पावैं सुख धाम । चौदा लोक पर जोत निरंजन, तीन देव परमान ॥ तीरथ व्रत औ चार वेदमें, इनमें जगत भुलान । सात सुरतिके ऊपर कहिये, सोइ पुरुष पुरान ॥ सही छाप गुरु उहांसो लाये, समरथके फुरमान । सतयुगमें सतसुकृत कहिये, त्रेता सुनिंदर नाम । द्वापरमें करुणा-निध स्वामी, कलियुग कवीर निधान । कालको जीव कही नहिं माने, कोट सुने जो ज्ञान ॥ जैसे लाख अगिनमें पिघले, बिछुरत काठ समान । जे करतासे सब जग उपजो, भूले ठौर ठिकान ॥ जुगनके जुगनके बिछुरे हंसा, भेटे पुरुष पुरान । तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, दोऊ दीन ले पान ॥ राजा रंक सकल फिर आवे, छोड़ि कुल अभिमान । पांच हजार पांच सौ बीते, चलि है पंथ
शब्दावली
(६९९)
निशान ॥ घर घर सत्य शब्द जो फैले, सतजुग बरते आन । साहब कवीर आये निज घरसो, फगुवा दीन्हे नाम ॥ निरगुन भगतीरूप कलजुगमें, वेद मरम नहिं जान ॥
होरी ४५—मेरे मन परदेसी मीत, होरी खेलिये ॥ जब जैहो घर आपने, तब कौन तुम्हारे साथ ॥ टेक ॥ बाहिर खेलन नाहीं पैहो, आनि गहे जमराज । बांह पकर जम ले चले, धरी रहे सब साज ॥ जो तुम काज आपनो चाहो, नाम गहो बहु भांत । अजहुं चेत अचेत बावरे, जन्म सिरानो जात ॥ ज्ञान पुटरिया बांधके हो, सुरत अबीर उडाव । जाय लगे पियके हिये, अब खेलनको दाव ॥ पांच नार तुमको सजी, पांच हुए के जात । वे रस चाहें आपनी, अपनी अपनी भांत ॥ साहब कवीर होरी रचो, मचो कुलाहलसोर । समझ देख नरबावरे, येतो होरी कैसे मोर ॥
होरी ४६—तेरो है घर कंथ सुजान, खेलो रंग भरी । जनम जनमकी मिटी कल्पना, पायो जीवन प्रान ॥ टेक ॥ पांच सखी मिल मंगल गावैं गुरुगम शब्द बिचार । बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, उठत शब्द झनकार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके, तनकी तपन बुझान । पिचकारी छूटे अति अदभुत, रसके कीच बहान ॥ सतगुरु मिल आपा बिसरावैं, लागी खेल अपार । जित कित होहो होय रही, रटना लगी हमार ॥ सुख सागरमें न्हाइये, निरमल भये शरीर । आवागमन तब मेटिया, जब फगुवा पाये कवीर ॥
होरी ४७—तज काम क्रोध मद मोह होरी खेलिये ॥ टेक ॥ ज्यों पंकज जलमें रहे, जल नहिं परसत देह । उर माया मन परहरी, सतगुरुसे कर नेह ॥ ज्ञान सुगंध गोद भर लीजे, कुबुध गुलाल उड़ाय । सत्यनाम गुन गाइये, जश को डफ बजाय ॥
(७००)
कवीरपंथी—
मानुष जन्म डुरलभ है संतो, खेलो फाग सुभाव । कहैं कवीर चित् चेतो हंसा, बहुर न ऐसो दाव ॥
होरी ४८—मिल खेलो बिमल बसंत, प्यारे कंथसो । खोल अंधेरी कोठरी, मिल बैठो महल एकंत ॥ टेक ॥ गगन मंडल दीपक धरे महल करो उजियार । छैल छबीले कब मिलो, मेरे जीवन प्रान अधार ॥ गंग जसुनके अंतरे, चंद सूरके बीच । अर्ध उर्धके मध्यमें जहां मची अरगजा कीच ॥ बिन पग निरत होत है, बिन कर बाजे ताल । बिन नैनन छबि देखिये, बिना सरवन झनकार ॥ जहां सुरंग रंग रहो, हिल मिल एकहि ठांव । धर्मनि भेटे भावसों, गुरु पाये अपने नाव ॥
होरी ४९—खेलत फाग वसंत रैन दिन । सहज शुन्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति । त्रिकुटी महल रच्योरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले । सोहं सोहं सौरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि । अगम निगमकी झोरी ॥ मानो कोटि भान ससि ऊगे । जहां मनुवां विलमोरी ॥ सुरति सुहागिनी संग लिये मनुवां । दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि, ब्रह्म ज्ञान झकझोरी ॥
फाग प्रारम्भ ।
फाग १—मेरे सतगुरु आये आज खेलन फागरी । वानी बिमल सुगन सब बोले अति सुख मंगल रागरी ॥ टेक ॥ चाँचर सरस सखा संग बोले । अनहद बानी रागरी ॥ शब्द सुनत अनुराग होत है । कहा सोवे उठि जागरी ॥ पानी आदर पवन बिछौना । बहुत कहूं सन्मानरी ॥ देत अशीस अमर पद लेऊँ । अब चल युग युग राजरी ॥ चरन प्रच्छालि चरनोदक लेहु । उठि उनके
शब्दावली
(७०१)
पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥ महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको । वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥ संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥
फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥ गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें । जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥
फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो । तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥ तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा । परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥
(७०२)
कवीरपंथी-
फाग ४-करि सुमरन सुरंग होरी खेलिये हो । ज्ञान पिचकारी ध्यान केशर भरि ॥ या विधि मनको लहिये हो ॥ टे० ॥ पांच सखी मिलि उठि उठि धावै । इनकी लुकट बचइये हो ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह सब । अबीर गुलाल उड़इये हो ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । अनहद नाद बजइये हो ॥ सुरति निरति और राग रागिनी । अनचित चितसो गइये हो ॥ चोवा चंदन अरु अरगजा । रसकी कीच मचइये हो ॥ कहै कवीर तब साध कहावैं । गुरुसों फगुवा पइये हो ॥ ४ ॥
धमार प्रारम्भ ।
धमार १-नित मंगल होरी खेलिये हो । अहो मेरे संतो नितही वसंत नित फाग ॥ टेक ॥ दया धरमकी केशर घोरो । प्रेम प्रीति पिचकारी ॥ भाव भगत सों भरि सतगुरुको । सुफल जनम नर नारी ॥ छिमा अबीर चरच चित चंदन । सुमरन ध्यान धमारि ॥ ज्ञान गुलाल अगर कसतूरी । उमंगि उमंगि रंग डारि ॥ चरणामृत प्रसाद चरण रज । अपने शीश चढाय ॥ लोक लाज कुल कानि मेटिके । निर्भय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मग्न महोछब । करि संतनकी भीर ॥ कबहुँ ना काज विगड़ है तेरो । सत सत कहैं कवीर ॥ १ ॥
धमार २-कोई नाम सनेही खेले वसंत । अहो मेरे संतो कुलकी हो कानि निवारी ॥ टेक ॥ सत्संगति अरु दया भावसों । लागो प्रेम गुरु संग ॥ आसा मूल निराश विसारी । बाजत नाद मृदंग ॥ डिम कपट गुलाल उड़े जब । लागो रंग अपार ॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । लागि रही इक तार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके । अति ही उलास आनंद ॥ भव विसारि कहु शंक न
शब्दावली
(७०३)
कीन्ही । सुरति शब्द गठि बंद ॥ चाचर रचि संग प्रीतमके । खुलिया ज्ञान भंडार ॥ पीवत नाम महारस छोके । निरखत रूप अपार ॥ कहैं सुने कछु वनती नाहि । जो खेले संत सुजान ॥ अजर अमर अविनाशी साहेब निर्भय नाम अमान । जरा मरण भय संशय छूटी । छाडचो विष संसार ॥ दास कवीर ऐसे खेलिये हो । आवागवन निवार ॥
धमार ३-निज नाम रंगीले रंग रंगे हो । अहो मेरे संतो छोड़ो हो कर्म अपार ॥ टेक ॥ छोड़ौ कनक कामनि बहु रंगा । याते कपट विकार ॥ जनम जनमके फंद कटत हैं । सतगुरु शब्द सम्हार ॥ जम पाटनको करम निवारो । हंस हो निरवान ॥ माया आस विचारि तजो जीव । बहुरि न भरम समान ॥ चेतो रे नर मूरख प्रानी । ये जम बड़ वरियार ॥ सार शब्द निश्चय उर धारो । भाग चले जम धार ॥ सत्सुकृतको निजकर सुमिरो । गहो अगमकी डोरि ॥ सतगुरु सेती परिचय पाइये । छूटचो जमको जोर ॥ पारस परस अमर घर पायो । हंस भये अस्थीर ॥ सदा करारी जुरा न व्यापे । ता रंग रंगे है कवीर ॥
धमार ४-कोई नाम रंगीले रंग रंगे हो । मेरे साधो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेम ते गगन परवावज बाजे । सुनिये छतीसों राग ॥ आवरन वरन गुलाल बहु रंगी । बहु रंगी पांचो राय ॥ बीस पांच अरु तीन सहेली । खेल त्रिकुटीमें आन ॥ अगर अबीर कुमकुमा केशर । अष्ट कमल परमान ॥ गगन मंडलमें खेलत हौं होरी । तत मता गल तान ॥ फगवा लेन भरली विधि आवो । पावे मुक्ति फल दान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । पांच पचीसों मारि ॥ नाम गहे ते परम पद पावे । पुनरपि जनम निवारि ॥
(७०४)
कवीरपंथी—
धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥
धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥
धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।
शब्दावली
(७०५)
जवानीमें जोवन जोर ॥ यह मन भल कहो नहि माने । सांझ गिने नहीं भोर ॥ सनकसनंदन सुखदेव खेले । खेले शेष महेश ॥ कुलकुँ छाड़ि विभीषण खेले । कीन्हे हैं लंक नरेश ॥ अविनाशी संग विनसत नाहिं । जिनकी कथा अपार ॥ साधु ससुझि मूल गहि बैठे । सब जग लाग्यो डारि ॥ विरघ भयो कोइ नाम लैहै । ससुझि देख मन क्रूर ॥ निर्भय होरी खेल कवीर जी । घटहीमें हाल हजूर ॥
धमार ८—ऐसे खेलको कहा खेलिये हो । अहो मेरे साधो जामें आवागमन बसेर ॥ टे० ॥ निशि वासर जहाँ मिरतक व्यापे । भवसागरमें वास ॥ पांचों चोर छठो मन राजा । निश दिन करत विनास ॥ घर माटीको भीत झाँझरी । अष्ट धातको जडाव ॥ नव दरवाजे रहत मलीने । काहेको करत उपाव ॥ प्रकृति पचीसों संग जंजाली । काम क्रोध कोटवाल ॥ इतने कटकमें राजा भूलो । खेलत भरमको ख्याल ॥ भरम छोंड़ि अजहूँ किन चेतै । कहैं कवीर ससुझाय ॥ कहा हमारा जो कोइ माने । आवागवन नसाय ॥
धमार ९—अविनाशी दुलहा कवीर कब मिलिहो । अहो मेरो साधो सब संतनके रक्षपाल ॥ टेक ॥ जल उपजी जलसों नहि नेहा । रटत प्यास प्यास ॥ मैं विरहिनि ठाढी मग जोहूँ । राम तुम्हारी आस ॥ दिवस न भूख रैन नहीं निद्रा । गृह आँगन न सुहाय ॥ सेजरिया वैरन भई हमको । जागत रैन विहाय ॥ छांडया गेह नेह लाग्यो तुमसो । भयी चरन लवलीन ॥ तुम विनु जियरा यूँ तलफतु है । जैसे जल विनु मीन ॥ हमतो तुम्हारी दासीहो प्रभुजी । तुम हमरे भरतार ॥ दीन दयाल दयाकर आवो । साहिब सिरजन हार ॥ कै तो प्रान तजति हूँ साहेब । कै अपनी कर लेव ॥ दास कवीर विरह अति बाढी । हमको दर्शन देव ॥
कवीरपंथी शब्दावली २३
(७०६)
कवीरपंथी--
धमार १०—कैसे जीवेगी विरहनी पिया विनु हो । अहो मेरा साधो कीजे हो कौन उपाय ॥ टेक ॥ दिवस न भूख रैन नहीं सुख है । जैसे कलिजुग जाँम ॥ खेलत फाग छाड़ि चलि सुंदर । तजि चलि धन अरु धाम ॥ बन खंड जाय नाम लव लावो । मिलि पिया सुख पाय ॥ तलफत मीन विना जल जैसे । दर्शन दीजे हो धाम ॥ विना अकार रूप नहीं रेखा । कौन मिलेगा आय ॥ आपन पुरुष समुझिले सुन्दरी । देखो तन निरताय ॥ शब्दसरूपी जब पिया बुझो । छाड़ो भरमकी टेक ॥ कहै कवीर आन नहीं पूजा । जुग जुग हम तुम एक ॥
धमार ११—खेले तेरी माया मोहिनी हो । अहो मेरे साधो जिन जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ चंद्र वदन मृगलोचनी माया । विद्वैलो दियो है लिलार ॥ जती सती सब मोहि लियो है । गज गति वाकी है चाल ॥ हरे रंगकी चूँदरी हो । माया पहिरे ताही ॥ शोभा अद्भुत रूपकी हो । महिमा वरनि न जाय ॥ जेते तेते लिये हो । घँघुट माँहि समाय ॥ आजन वाकी रेख हो । अदग गयो नहीं कोय ॥ छिड़कत थोथे प्रेम सुमाया । भरि पिचकारी गात ॥ सनकसनंदन कहत है । औरकी केती बात ॥ अनहद ध्वनि बाजा बाजे हो । सरवन सुनत भयो चाव ॥ खेलन हारे खेलिहै हो । बहुरि न ऐसो दाव ॥ ज्ञान डगा षग रोपिया हो । टारचो टरत न पांव ॥ बाँस लिये कर आपने हो । फिरि फिरि झूत जाय ॥ ब्रह्मा शंकर वश कियो माया । दोऊ पकडे जाय ॥ फगुवा लीन्हो आपनो हो । बहुरि दियो छिटकाय ॥ नारदको सुख मोरिकै । माया लीन्हो बसन छुटाय ॥ गर्व गहेली गरबते हो । बहुरि चली मुसकाय ॥ सुर नर मुनि एक ओर भये हैं । एक अकेली आप ॥ सन्मुख कोऊ ना रहै हो । मारि लियो एक धाप ॥ इन्द्र सकुच
शब्दावली
(७०७)
ठाढे गढौ भयो हो । लोचन ललित अंजाय ॥ हरि अविनाशी उबरे हो । कहै कवीर गुण गाय ॥
धमार १२-भरम भुली माया जग मोहै हो । अहो मेरो साधो खेलत भ्रमको ख्याल ॥ टेका ॥ कटि केहरि गज गामिनी माया । संशय कियो सिंगार ॥ राखे रोकि सब मोह नदीमें कोऊ न उतरचो पार ॥ ब्रह्माको चित्त चोर लियोहै । शिवको लीन्हों साथ ॥ बस किय विष्णु विश्वके ठाकुर इंद्र नवायो माथ ॥ तैंतीस कोटि छले सुनि देवा । डारचो भरम गुलाल ॥ बरन फेरि अवरन होय नाची । ऐसी अलबेली नारि ॥ पंडित आविन आँजन आँज्यो । मूरख आँखिन धूरि ॥ जती सती सब बाँसन मारे सुरनर सुनि किय चूर । गोपीचंद भरथरी गोरख । खेलन आये फाग ॥ शृंगी ऋषि पाराशर लुटे ॥ छांडि छांडि वैराग ॥ सात दीप नौखंड तिहुपुर । फगवा सब सो लीन ॥ ठाढी विनती करै कबीरसों, हम तुमरे आधीन ॥
धमार १३-तुम दीन दस खेलों साजना हो । अहो मेरो सेतो बहुरि न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ रिनु वसंत माया संजोरी । कछुक करो अनुराग ॥ फिरि पीछे पछतावगे संतो बीति जायगी फाग ॥ ग्यान डगा तुम रोपि हो । सन्मुख रहो सम्हारि ॥ मारेगी चित्त चोरकै हो । मोहिनि चंचल नारि ॥ हरि सुभिरनकी गारी दीजै । गुरुकै वचन संम्हारि ॥ साधु संगति तुम जोरिकै हो । कबहुं न आवेगी हारि ॥ अनहद बाजा बाजे सखीरी । नौतम प्रीतम ठाय ॥ केशरि चरचो प्रेमकी हो । जुग जुग रंग न जाये ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । तीन तीसको मारि ॥ नाम गहेते परम पद पड़ये । आवागमन निवारि ॥
धमार १४-कर मन संग भरमत केई जुग गये । अहो मेरो
(७०८)
कवीरपंथी-
साधो उपज्यो न केवल ज्ञान ॥ टेक ॥ कबहुँक बन चर तुम भये हो । कबहुँक तिन चर रूप ॥ कबहुँक सिंह दहारत वनमें । कबहुँक मीड़क कूप ॥ कबहुँक नरपति तुम भए हो । कबहुँक मांगत भीख ॥ कबहुँक गज होय घूमंत डोले । कबहुँक मस्तक लीख ॥ कबहुँक विकत तुम भयो हो । कबहुँक गये फँदे जंगल ॥ कबहुँक उड़िकै गये गगनकूँ । कबहुँ गये पाताल ॥ कबहुँक सुरपति तुम भये है । कबहुँक नरक निदान ॥ कहै कवीर ऐसे भरम डोले । जैसे सूकर स्वान ॥
धमार १५-ऐसे पिया संग होरी खेलिये हो । अहा मेरो साधो सुरति सुहागिन नारि ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखियनकी संगति तत मत सखी लिया साथ ॥ अरस परस पियाके संग राची । सहज लकुटिया हाथ ॥ गगन मंडलमें होत कुलाहल । उठत राग अनुराग ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । बहु विधि भयो सुहाग ॥ ग्यान गुलाल अनहद अरगजा । चित चोवां मन लाय ॥ कर-करनी केशरि रंग भीनी । विन रसना गुन गाथ ॥ धन सतगुरु धन साधुकी संगति । धन हमारे भाग ॥ सांची फाग भगति सतगुरुकी । कहै कवीर सुहाग ॥
धमार १६-अभि अंतर अनहद सुरली बाजे । अहो मेरो साधो चलो न देखन जाय ॥ टेक ॥ काया कुंज गली वृन्दावन । अनुभव जमुना नीर बैन वजाई बीचमें मोहन नाभि कमलके तीर ॥ सुधि बुधि विसार गई सब श्यामा । सुनि सुरलीकी टेरे ॥ उलटी सिंगार कियो है आतम । पहरचो है अम्बर फेर ॥ सुरलीको शब्द सुनत सब गोपी । भूलि गई परिवार ॥ पांच पचीस ॥ सखी संग राधो । भेटन चली है सुरार ॥ आस पास गोपियनको मंडप । विचि विचि परमानन्द ॥ भयो उछाह प्रेम अति
शब्दावली
(७०९)
वाटचो । ज्ञान उदय जिमि चंद ॥ थाके चंद सुरगुन मारुत । वहै न जमना नीर ॥ सुनि सुनिवरको ध्यान डिग्यो है । बछा न पीवै क्षीर ॥ घट घट रास रच्यो वृन्दावन । घट घट गोपी कान्ह ॥ घट घट राम रमे अविनाशी । जाने कोई संत सुजान ॥ सतगुरुके प्रताप सखीरी । वरनि सुनायो रास ॥ मानुष जन्म सुफल भयो साधो । विं धनि धरमदास ॥
धमार १७—अहो अविनाशी दूलहा कब मिलिहो हो ॥ हो भाई साधो मिलिहो सनेही आय ॥ टेक ॥ जल उपजे जलसो नहिं नेहा, रटत पियास पियास । मैं विरहिन ठाढी मग जोहों, पिया मिलनकी आस ॥ दिन नहिं चैन रैन नहिं निद्रा, घर अंगना न सोहाय । सेजरिया बैरन भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥ हूं तो तुम्हरी दासी साहब, तुम हमरे भरतार । दीन दयाल दया करो जन पर, साहब सिरजन हार ॥ आमिनकी बिनती सुन साहब, रहूं चरन लौ लीन ॥ तुम बिन जियरा ऐसे तलफे, जैसे जल बिन मीन ॥ की हम प्रान तजत हों साहब, की आपन कर लेव । साहब कवीर बिरह रस भोगी हमहूं को दर्शन देव ॥ १ ॥
धमार १८—अहो ऐसे गुरु संग, होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, जरा मरन भ्रम जाय ॥ ज्ञान जुगतकी कर पिचकारी, छमा चलावन हार । आतम ब्रह्म संग खेलन लागे, पांच पचीस मंझार ॥ ज्ञान गलीमें खेलैं होरी, मची प्रेमकी कीच । लोभ मोह दोउ कुटि कुटि मैं, सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुट महलमें बाजा बाजे, हौ छतीसो राग । ज्ञान ध्यान दोउ देखै तमाशा, सतगुरु खेलैं फाग ॥ ईगला पिंगला सुषुमन रोको, सुरति निरति दोउ नार । अपने पिया संगहोरी खेलो, लजा कान निवार ॥ सुन्न महलमें होत कुतूहल, करहिं राग
(७१०)
कवीरपंथी—
अनुराग । अपने पियाके दरशन पाऊँ, पूरन प्रेम सुहाग ॥ सत-गुरु फगुवा पाइया हो, मारग दियो बताय । कहैं कवीर जो यह तत्त्व पावे, सो जन लोकहि जाय ॥
धमार १९—अहो साहब संग होरी खेलिये हो ॥ हो भाई साधो हो खेलो तन मन वार ॥ टेक ॥ धोखेकी एक होरी बनाई, भवको डाँढो गाड़ । दुबधा की जार लाय इत उतसों, लब्बाको देउंगी जार ॥ प्रेम पावक ले होरी दागों, कर्म बरूला डार । भावर दे दे मंगल गावों, त्रिगुण फंद निरवार ॥ ससुझकी झोरी सुमतिने पकरी, होरीकी भस्म लई झार । जित कित धूर उड़ाय जगत पै, कुल पर डारोंगी छार ॥ करनी को केशर घटमें घोरों, रहन करो पिचकार । परख पतंगके रङ्ग उतारों, देउंगी मन पर डार ॥ दया अबीर गुलाल धर्म कर, चित चंदन लेह गार । सतगुरु मुख पर डारों, प्रीतिसों, पाँचौ चोरन मार ॥ जो कछु चाल होय गुरु सप्रथ, पहिले देहु तिस्वार । आमिनकी बिनती सुन साहब, फगुवा देहु हमार ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर, अब है राह बिचार । अमी अंक परवाना पावै, पहुंचे पुरुष दुआर ॥
धमार २०—अहो बैरागी नागर होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, खेलो निरगुन नाह ॥ गढ बांधोंमें चाचर खेलै, निरगुन नाम विचार । संगन सनेह, हंस परबोधो, जमसो जीव उबार ॥ सूर सनेह गहो निशि बासर, सुषुप्त वेद टकसार । निरगुन नाम निअच्छर गावो, जुग जुग शब्द पुकार ॥ मंदिर-सों निकसी एक सुंदर, कर पग शीश न छंद । बिन नेनन देखिये वाकी सुरत, दिन दिन परम अनंद ॥ बिन जुगबंध काल छोड़े, बहु विधी भेष बनाय । जब लग जमकों चिरे न कागद,
शब्दावली
(७११)
काल धरी धरखाय ॥ पिंड न प्रान देह नहि सुंदर, विन रसना गुन गाय । ऋग यजु साम अथर्वण थाके, विन गुरु कौन लखाय ॥ जोजन तीन चले विन चरनो, करपलो परमान । सुर नर मुनि जाको मर्म न जाने, निरगुन चतुर सुजान ॥ तैंतीस कोटि देव नहि जाने, निरगुन भेद नियार । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, परख परख टकसार ॥
धमार २१—अहो करनाटक नागर होरी खेलैं हो हो ॥ हो भाई साधो हो खेलैं जो राय बंकेज ॥ टेक ॥ एक समय गज अस्थल आये, करनाटकके लोग । बिहँसि बिहँसि सब मंगल गावैं, बहुत करहिं सुख भोग ॥ राय बंकेज हंसनके राजा, गज अस्थल कडिहार । हंसन पार उतारहीं, परख परख टकसार ॥ हंस हंस युग बांधहीं, जम सों जीव छोडाय । सत्य शब्द दे लोक पठावैं, अभय निशान बजाय ॥ ज्ञान सुगंध धरो घट भीतर, कुबुधि अबीर उडाय । सुरति शब्द जीवनको दीन्हे, हंस लिये सुकताय ॥ भये लवलीन हंस सुकताहल, सतगुरु बांह चढाय । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, तबहिं अभय पद पाय ॥
धमार २२—अहो भर्म भारी माया जग मोहे हो हो ॥ हो भाई साधो हो जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ कटि केहरि गजगामिनि माया, संशय कियो सिंगार । रोक रही सब मोह नदी में, कोई न उतरे पार ॥ ब्रह्माके चित चोरी माया, शिवको लीन्ही साथ । बस कीन्ही बसुधाके ठाकुर, इंद्र नवावै माथ ॥ तैंतिस कोटि छले मुनि देवा, डारी बिरह गुलाल । बरन फेर अबरन होय नाचे, ऐसी अबला नार ॥ पंडित आंखिन अंजन दीन्हे, मूरखके सुख धूर । जती सती सब बांसन मारे, सुर नर मुनि किये चूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, आये खेलन फाग । शृंगीऋषि पाराशर
(७१२)
कवीरपंथी-
आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥
धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥
धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,
शब्दावली
(७१३)
भँवर गुफा निज वास ॥ गगन मंडलमें होरी खेलैँ, तत्त्व मता गलतान । फगुवा नाम लिये बन आवै, पावै मुक्ति फलदान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो, तीनों तापको मार । निगम ये जावो परमपद पावो, पूरन जन्म निवार ॥
धमार २५-अहो सतगुरु संग होरी खेलिये हो हो ॥ भाई साधो हो बहुर न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ खेलत हंस बंस कर लीन्है, मित गये विषय विकार । भाव रचेउ रंग संग निज पायो, खुलगये दशाहु दुवार ॥ गगन गुलाल उड़ाव रैन दिन, भर पिचकारी शील । खेलत हंस परमपद पावै, बिमल हंसनकी भीर ॥ गगन मंडलमें हंसा खेलै, चढे सवाया नूर । खेलै हंस सोहंगम डोरी, वर पाये भरपूर ॥ सोरह सुतका एक तत्त्व है, जासों न्यारा बीज । कहै कवीर हम निश दिन खेलैँ, सतगुरु दीन्हा चीज ॥
धमार २६-अहो नित मंगल होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, नितही बसंत नित फाग ॥ दया धरमकी केशर घोरो, प्रेम प्रीति पिचकार । भाव भक्ति भर भर सतगुरु सो, सुफल जनम नर नार ॥ छमा अगर छिरक चित चन्दन, सुमिरन ध्यान धमार ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, उमँग उमँग रंग डार । चरनामृत प्रसाद चरन रज, अपने शीश चढाय । लोक लाज कुल कान तोरके, निरभय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मगन महोत्सव, करे संतनकी भीर । कबहुँ न काज बिगरे नर तेरो, सतगुरु कहै कवीर ॥
धमार २७-मन रंगी राजा खेलै धमार ॥ काहूको पाताल पठावै, काहूको देत अकाश । काहूको बैकुंठ पठावै, फिर फिर नरकमें वास ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बांधे, माया रसरी डार । सुर नर मुनि सबहीको बांधे, कोइ न सके निरवार ॥ जोगी जती
(७१४)
कवीरपंथी—
तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार । कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥
शब्द चाचर ।
चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥ चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी । सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥ काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया । ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥ षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥ पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥ सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर
शब्दावली
(७१५)
जन्म न होई ॥ कहैं कवीर विचारिके खेलो तुम साधो । न्यारा सबही खेलते जाको अवराधो ॥ १ ॥
सत्यनाम ।
अथ कहरा प्रारम्भः ।
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कहरा १-मतसुन मानिक मतसुनु मानिक मतसुनु मानिक सब धारैरे । मगन हुआ जब घर उठिचाला गुरुके चरण चित तुव धारैरे ॥ बगला पक उछारी मच्छी सो धिमरा कैसे पावैरे ॥ वंसी टूटि पड़ी पानीमें है कोई गांठ जुरावैरे ॥ तीन लोक धिमरा फिरि आया सिमरीके अन्त न पावैरे ॥ चारी चरण सिमरीके कहिये नो पंखुरी पखानारे ॥ नाका तोड़ि बैठ उर अंतर सतगुरु जुगति लखानारे ॥ दो मुख शब्द पडे टकसारा बूझै संत सुजानारे ॥ सुर नर मुनि और औलिया ब्रह्मा विष्णु महेसा रे ॥ कहै कवीर शब्द विन परखै पार न पाया सेसा रे ॥
कहरा २-अरे मन मिहरा करहु तयारी विलंब करे भल नाहि रे ॥ बेगहि सुरति करो तुम धुरकी दिन सब वीते जाहिरे ॥ पांच कोटि और नौ हैं नारे वे सब वेगि मुखैहैरे ॥ यह तन नदी झर हुइ जैहै मंछा हाथ न ऐहैं रे ॥ धीरज करी तुम डारौ वंशी इस विधि मंछा ऐहैरे ॥ नातर तो मगरा हरि खैहैं जीव अकारथ जैहैरे ॥ निरति सुरति करि धागा बांटो शब्द सुई पहिरावोरे ॥ अंतर कबहुं रहन न पावै ऐसा जाल बनावोरे ॥ शब्दकी डोरि तहां गहि राखो इस विधि जाल पसारोरे ॥ पांच पञ्चीसो सिमरी भमरी सोई वेगि धरि मारौरे ॥ ए मन मिहरा वेगि मथौ तुम पवन महर ले साथारे ॥ इक मत हुईकै चढोना उपर सिमरी आवै हाथारे ॥ वा सिमरीको लखै न कोई जहां मनसा जाई रे ॥
(७१६)
कबीरपंथी—
पिछले महरा जहाँ लग होते खोजत रहे भुलाईरे ॥ नौ दरवाजे हैं सिमरीके जे सबहि तुम रोकोरे ॥ पिछली प्रीति बिना कर जोरे दास पठावै छेकारे ॥ जिस सिमरीके रूप न रेखा नहि बरन नहि मेषारे ॥ जा खोजत सुरनर सुनि थूले कोई विरले पेखारे । झिलमिल नीर तिरवेनी संगम तहाँ ब्रह्मका बासारे ॥ कहै कबीर सुनो तुम साधो एक नामकी आशारे ॥
कहरा ३—नाम सुमिर मन नाम सुमिरि मन नाम सुमिर मन मेरारे ॥ आवत जात बहुत दुख पैहो धरि धरि तन बहु तेरारे ॥ बालापनके गुनह करम सब प्रगट कहौ सुनिहौरे ॥ सुखसे भेट भयी नहि कबहूँ बहु दुख दारुण कीयारे ॥ सरवन कथा सुनी नहि कबहूँ वचन सुचि मानारे ॥ नयना सुंदर रूप लुभाना यही करत मन माहिरे ॥ जीभ्या तेरी षड्दर राती है अंतर रस मानीरे ॥ नासा तेरी वासकी बासे विशेष विशेषारे ॥ सरवन तेरे रागके भीने अनहद शब्द न परेखारे ॥ कामी पड़े कामके वशमें छीतज दिन औ रातीरे ॥ एक घडीके सुखके काजै खोवे कुल और जातीरे ॥ संगी तुम्हरे गुता महरम लाजत नहि लबारारे ॥ राग बाग तन कस करि बांधो शब्द गहो हथियारारे ॥ गहि हथियार खेत मत छांडो रहियो खेत मंझारारे ॥ सूरा पनकी गति है न्यारी जाने संत कोई सुरारे ॥ पांच पचीस पकड़ि वश कीने जूझे गगन दुवारारे ॥ शूरा होयसो सम्मुख जूझै दरसै अलख अपारारे ॥ समष्टिको सतगुरु दर्शे परसे अपरम पारारे ॥ ऐसी रहन रहै कोइ हंसा आवै लोक हमारारे ॥ कहै कबीर नाम को कहरा परख शब्द टकसारारे ॥
कहरा ४—निहुरि नाच मन निहुरि नाचमें तेरी दुलहिनियारे ॥ निहुरे नाचे शब्द विचारै चित्र विचित्र रहिनियारे ॥ कुंवटा एक
शब्दावली
(७१७)
पांच पनिहरियाँ पनियां भरे पतलवारे ॥ बात सखीनसों चित गगरी सो चित सों गगरी न छूटे रे ॥ चित छुटे तो गगरी फूटे पनियां खिर गगरी फूटे रे ॥ पानीके प्यासे पीरेवा उर बैठि शब्दकी छहिरे रे ॥ आगि लगे तेरी मथुरा नगरीया कान्ह पियासे जैहैरे ॥ ज्ञान धनुईयां सुमति तीरले तृष्णासों विधि मारे रे ॥ कहै कवीर नामको कहरा महरम कोई विचारैरे ॥
कहरा ५-सूल छाँडि ते डारन लागा ते नर परम अभागारे ॥ सोइ सोइ सब रैन गँवाई भोर भये नहिं जागारे ॥ शब्द पुकारत जागत नाहीं जनम जनमके सुतारे ॥ बांधे गरे रहटकीसी घडिया आवत जात विगूतारे ॥ पूरब जाऊँ तो राम बखाना पश्चिम अल्लाह मकानारे ॥ दोनों दिन खोजि हम देखे सतनाम मन मानारे ॥ देवल जाऊँ तो पत्थर पूजा तीरथ जाऊँ तो पानीरे ॥ आसपास पकिमा दीनी पत्थर न बोला बानीरे ॥ ओछी बुद्धि अगोचर बानी सो गति विरले जानीरे ॥ गुरुका सबद बसे जिस घरमें सोई सतब्रह्म जानीरे ॥ तुरक मसीत देहरा हिन्दू दो बिच राम खुदाईरे ॥ तहां मसीत देहरा नाहिं जहां अगम ठकुराईरे ॥ विन गुरु ज्ञान भरोसा किसका सरनो किसके रहियेरे ॥ कहैं कवीर एक तरवर फूला उपजी अनहद बानीरे ॥
कहरा ६-पंछी एक चौँच विन पगका विन पंख उडि आवैरे ॥ अलष अलेष लषै तन मनमें जोरे तनक डुई जावैरे ॥ गगन मंडलमें उसका वासा अनहद नाद बजावैरे ॥ डुइकै बीच ब्रह्मका वासा सतगुरु होय लषावैरे ॥ मांको मारि बापको बांधे घरमें अगिन लगावैरे ॥ काम क्रोधका करै पियाला निरत सुरत ठहरावैरे ॥ सलिल न्हाई देखि जमुना कौं भंवर फाकौं धावैरे ॥ नाम कमलकौं समकरि राखै अठसठ चार मिलावैरे ॥ बंक