भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

नयन कज्जल मसि लाय । बीच बीच बिरहा लिख भेजो, दुख सुख लिखो न जाय ॥ सतगुरु आये कंठ लगाये, मिट गइ तपन हमार । गुरु प्रताप ताप गई तनकी, धर्मनि कहें पुकार ॥

होरी ४२—मैं तो आन परी चोरनके नगर, सतसंग बिना जिव तरसे ॥ टेक ॥ हाथके हीरा डार दियो, का सूठी भरी कंकरसे । होरी खेलनकी यही बेर है, फिर चौरासी मंदिलसे ॥ अपने पिया संग होरी खेलों, और न काहू मनसे ॥ कहैं कवीर यह मोहिं लखाया, क्या छोड़ चले हो फिरसे ॥

होरी ४३—मैं तो अब कैसे खेलोंगी होरी, मोहि लागी शब्दकी डोरी ॥ टेक ॥ या होरीका सकल पसारा, लोग कहे थोरी थोरी ॥ होरी खेलो जो अपने पिया संग, या होरी मेरे अंग बयोरी । निश्चि दिन खेलों अपने पिया संग, दूटत नाहिं न डोरी ॥ धर्मदास सतगुरु सों माते, साहेब कवीर भ्रम तोरी ॥

होरी ४४—गुरु लाये मुक्तिके पान, प्रीतम आये हो ॥ टेक ॥ पान परवाना देत जीवनको, वे पावैं सुख धाम । चौदा लोक पर जोत निरंजन, तीन देव परमान ॥ तीरथ व्रत औ चार वेदमें, इनमें जगत भुलान । सात सुरतिके ऊपर कहिये, सोइ पुरुष पुरान ॥ सही छाप गुरु उहांसो लाये, समरथके फुरमान । सतयुगमें सतसुकृत कहिये, त्रेता सुनिंदर नाम । द्वापरमें करुणा-निध स्वामी, कलियुग कवीर निधान । कालको जीव कही नहिं माने, कोट सुने जो ज्ञान ॥ जैसे लाख अगिनमें पिघले, बिछुरत काठ समान । जे करतासे सब जग उपजो, भूले ठौर ठिकान ॥ जुगनके जुगनके बिछुरे हंसा, भेटे पुरुष पुरान । तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, दोऊ दीन ले पान ॥ राजा रंक सकल फिर आवे, छोड़ि कुल अभिमान । पांच हजार पांच सौ बीते, चलि है पंथ