कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रोम रोम लगी तारी ॥ दस दरवाजे घेर मन पकरो, डुरमति खैंच उतारी । घूंघुटके पट खोल गये हैं, लोक लाज सब झारी ॥ होरी खेल उलट घर आवे, सो तिरिया पिय प्यारी । कहैं कवीर टरे नहिं टारी, परम पुरुषकी नारी ॥
होरी ३९-फागुन आयो दुख देन सखीरी, मेरो पिया घर नाही ॥ टेक ॥ अपने अपने भवनसो निकसे कामिन कंथ । मेरो पिया परदेस सखीरी, मोको कैसे बसंत ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, का घसि लाँक अंग । सुध बुध मेरी गई सब सजनी, वाही पियाके संग ॥ तेरो पिया समीप सखीरी, तू तो हिलमिल खेल । नाहीं वर मेरोरी सजनी, गयो है ऊभी मेल ॥ एक संदेशा सुनरी सजनी, पिया घर आवैगे आज । दुबरी विरहिन भई बावरी, अजहुँ न आवे लाज ॥
होरी ४०-खेलो सइयां संग होरी, रंग भीनी पिया सों ॥ टेक ॥ निरगुन रूप लियो घट भीतर, मनसा हौदे भरोरी । चित चोवा बुध कैशर कहिये, भाव अरगजा घोरी ॥ शील संतोष ज्ञान उजियारो, पिचकारी भक्ति भरोरी । कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, जाते भाग जगोरी ॥
होरी ४१-फागुन मेरोरी मैं कैसे भरों दिन रैन ॥ टेक ॥ परकी फाग पिया संग खेली, अबीर गुलाल उड़ाय । आसोंकी फाग पिया घर नाही, खेलोंगी हमरी बलाय ॥ हमरे आंगन चंदनके बिरवा, जहैं चढ बोले काग । झूठे सगुन तुम्हार सखीरी, झूठे बनके काग ॥ उड़ उड़ काग सुलछना, जो पिय आवैगे आज । असी कोस मोरे पिया बसत हैं, सो कस आवैगे आज ॥ हमरे बालम फुलवारि लगाई, मृगा चुन चुन जाय । मारोंगी मृगा गुलेलसों, नयन कमान चढाय ॥ अपने बलमाको पतिया भेजों,