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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 742

(७२८)

कबीरपंथी—

माँहोरे ॥ उदैं भयो तिमर सब खोया अंधकार सब नासारे । कहैं कबीर विचार अभै पद निहतत निजवासारे ॥

कहरा ३६—हम तो भरम विसारि डारिकै एक एक करि जानारे । दूजा कहै गहीकै दूजा जिन नाही पहिचानारे ॥ एकै पवन पावक औ पानी और पानी एकै जुत संसारारे ॥ एक खाख गढे बहु भांडे एकै सिरजन हारारे ॥ जैसा बढई काठे काटै अगिनि न काटै कोईरे ॥ ऐसे व्यापि रह्यो अभिअंतर धरैं सरूपा सोईरे ॥ माया मोहकरि जगत भुलाना अर्थ देखि पतियाना रे ॥ होइ निरशंक कछू नहीं व्यापै कहैं कबीर गियानारे ॥

गौरी प्रारम्भ ।

गौरी १—संतो मन चीन्हो रे भाई । मन चिन्है विना परलैतर जैहौ जीवको जमले जाई ॥ टे० ॥ मन चिन्है ते हंस हमारा । तजे खलककी आस ॥ छूटै पिंड काल नहि पावै । पावै मुक्ति निवास ॥ मूल लेखामैं जीव जो आवै । दुविधा दूर बहाइ ॥ पुरुष नामको सुमिरन करिकै । अगर डोरि चढ़ि जाइ ॥ निशि दिन सुरति करै साहिबसों । सबद हेत लिय बोले ॥ कहैं कबीर सुनो भाई संतो । सो जीव कबहुँ न डोले ॥

गौरी २—जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । तेरो नाम न कोईलैहै ॥ ॥टेका॥ सूखै ताल नीरकै निबडै सूखै कमल कुंमलैहै ॥ सूखै पुरइन सरकी शोभा । जित तित धूर उडैहै ॥ जब लग तेल दीप में बाती । दिष्ट पडे सब कोई ॥ निपटै तेल बीत गइ बाती । जग अंधियारा होई ॥ जा प्रीतमसो प्रीति करत हैं । ताहीको अंग डरिहै ॥ दूर करो मंदिरसों बाहिर । प्रेत भया धरिखैहै ॥

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