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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७२७)

कहरा ३३-तन धरि सुषिया कोई न देखा जो देखा सो दुखियारे ॥ ऊगन आथनकी बात कहत हौ सबका किया विवे- षारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव दुखिया जिन यह राह चलाईरे ॥ सुखदेव आचारी दुखके कारन गरभहि माहि छपाईरे ॥ राजा दुषिया रानी दुषिया एक दुषी धनहीनारे ॥ जोगि दुखी और जंगम दुखिया कपटीको दुख दूनारे ॥ आशा तूष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहीं सूनारे ॥ घाट वाट तो सब जग दुखिया क्या गेही पटगीतारे ॥ कहे कवीर यह सब जग दुखिया कोई संत सुखी मन जीतारे ॥

कहरा ३४-सतगुरु आइ करी निज दाया अब हम आया चीन्हारे ॥ निज बुध रूप पिरापत नितही अचरज सहीछु कीन्हारे ॥ ना हम मनुष देवता नाहीं ना गेही वन पंड़ीरे ॥ ब्राह्मन छत्री वेसहू नाहीं ना हम सूदर डंडीरे ॥ ना हम जोगी ना हस जंगम ना हम तपी सन्यासी रे ॥ ना वैरागी ना ब्रह्मचारी ना हम जपी उदासीरे ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख ना पंडित न पोथीरे ॥ ना हम शायर ना मरजीवा ना हम सीप न मोतीरे ॥ ना हम गगन सुन्न भी नाहीं ना हम तेज न पानीरे ॥ मन बुधि चित अहंकार भी नाहीं ना हम वेद न वानीरे ॥ ना हम अमर मरै नहिं कबहुँ हम कवीर ज्योंका त्योंहीरे ॥ व्यास कपिल और वामदेव ऋषि सबकी अनुभव यौहीरे ॥

कहरा ३५-ग्यान विचारन ग्यान विचारन ग्यान विचारन जोगीरे ॥ रहै उदास सबसे सबहुनमें सुषमनि सुरति संजोगीरे ॥ जैसे कमल रहै जल भीतर जलसे रहत निनारारे ॥ ऐसे साधु रहै जगमाहीं परम तत्व निखारारे ॥ जैसे धाइ बालको पोषै अपनो जानत नाहीरे । करम करै करता न कहावै यौ साधु जग