भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

चितवन कीन्ह॥ जलमें बोर अगिनमें डारे, विनशत नाहिं शरीर । मस्ता हाथी आन झुकाये, निरभय सत्य कबीर ॥

होरी २१—बीतो जात बहार, होरी खेलन आई॥ टेक॥ पांच पचीस बनिता बन आई, खेलत धूम धमार । अपन पिया संग होरी खेलो, मेट सकल भ्रम जार॥ आतम रंग सुरंग बनाये, प्रेम प्रीति पिचकार । कहैं कबीर ऐसी होरी खेलो, आवागवन निवार॥

होरी २२—होरी खेलन तो जाग सखीरी, फिर ऐसा दाव न पाइये॥ टेक॥ मनको तार बिरहमिरदंग, बाजत हरिगुन गाइये॥ तन कर मटका मन कर केशर, झीलको रंग जमाइये ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, सांचेको टीको लाईये ॥ जप कर मंजन तप कर संजम, दर्शन फगुवा पाईये ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधू, नाम पदार्थ धाइये ॥

होरी २३—अपने पिया संग होरी खेलो, सुमति सखी संग लाय ॥ टेक॥ खेलों मैं होरी अंगना मेरो, तन मन सुरति लगाय । प्रीतम पास आस भई पूरन, राखों मैं हिरदै समाय ॥ दुबधा दुरमति दूर परानी, जब देखो निरताय । परसत अंग रंग भये अविचल, तनकी तपन बुझाय ॥ अजर अखंड अमान अभै पद, कौन सकै गुन गाय । गुनवंती निर्गुन गुन राखो, गुरुगम प्रीतम पाय॥ प्रीतम पास सेज सुख विलसो, यह सुख बरनि न जाय । धर्मदास ऐसी होरी खेलो, सब संशय मिट जाय ॥

होरी २४—हेरे प्रीतमजी की बाट, ठाढी अलबेली ॥ टेक॥ गंगा जमुना बहे सरस्वती, तिरवेनीको घाट । अर्ध उर्धके मध्यमें मूरख पाई सांट । सगरे पंथ बिच दोय गली जहां, भर केशरको मांट॥ कुमति करार होय रही अभागिन, मत कर मनकी आंट । पिया दरसनको प्यास भई है, चली जगतसे फाट॥ काम क्रोधकी मूठ