भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६११)

एकहि कुल उरझानी । एकहि नाम बिना डहकावे, हो रही ऐंचा-तानी ॥ तुम जिन जानो एही फाग है, ये कछु अकथ कहानी । कहें कर्वार सुनो भाई साधू, बूझे बिरला ज्ञानी ॥

होरी १८-या मन निपट अनारी, होरी खेलन न जाने ॥ टेक ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहकी, सिर पर गठरी भारी ॥ या नगरीमें पांच मवासी और पचीसों नारी ॥ इन्हें मार होरी खेलो पिया संग, बात सुधर जाय सारी ॥ सखी सहेली होरी खेलैं पिया संग, कुमति सखी रहु न्यारी ॥ कहें कबीर ऐसी होरी खेलो, हाथ सुमति लिये पिचकारी ॥

होरी १९-गगन मंडल उरझानी, नित फाग मची है ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अबीर अरगजा, सखियां ले ले धाई । उमैग उमैग रंग डार पिया पर, फगुवा दैव बहाई ॥ फगुवा नाम मिले मोहि सतगुरु, तनकी तपन बुझाई । शब्द डार जहां अगर उड़त है, शोभा बरनि न जाई ॥ गगन मंडलमें होरी मची है, गुरुगम झर लख पाई ॥ कहें कबीर मगन भई विरहिनि, आवागवन नसाई ॥

होरी २०-ऐसे नाम उजागर, होरी खेलन बर आये ॥ टेक ॥ कासीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नीरूके गृह आये । रामानंदके शिष्य भये हैं, निरगुन पंथ चलाये ॥ कथ निरगुन निज नाम अभय पद, सुन पंडित रिसियाये । षट् दरसन मिल बादको आये, जीत न काहू पाये ॥ एक दिना सब प्रपंच बहु कीन्हें, नारद आन लदाये । सबे लुटाय कछु नहीं राखी, लीन्हें साधु बुलाये ॥ कपड़ा बुने बैच ले आवें, तामें सबको देई । लाख टका कोई आन चढावे, ना काहूको लेई ॥ साह सिकंदर परचे लीन्हा, करामात दर्ई तीन्ह । कासी तज प्रभु मगहर आये, तब कछु