भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 707

शब्दावली

(६९३)

त्यागके, जगसों भई उचाट । कहैं कवीर मिलो पिय प्यारी, सतगुरु खोल कपाट ॥

होरी २५—छाये प्रीतमजी परदेश, मैंने अब जानी ॥ टेक ॥ अंग बिभूति रमाऊं निसि दिन, स्वेत जटा भये केस । घर घर अलख जगावत डोले, धर जोगिनको भेश ॥ मैं भौसागर भूल रही हों, लिखना भयो संदेस । ऐसे सतगुरु नाहि मिलै, मेरी सुर्त करे परवेस ॥ जाकी ध्यान धरे ब्रह्मादिक, ध्यावत शंकर सेस । नाम लेत भौसागर छूटे, कट गये करम कलेस ॥ जेठ देवरके मोह त्यागके, पियसे बांधो लेस । कहैं कवीर मिलो पिया प्यारे, छूटे सकल अंदेश ॥

होरी २६—तू कैसे हूस रहीरी, नहि हूसन वारी ॥ टेक ॥ कबकी मैं ठाढी तोहि मनाऊं, तू नहि चितमें धारी । गगन मंडलमें धूम मची है उठ चल वेग संवारी ॥ ईगला पिगला हाथ छरी ले, सुषुमन केशर गारी । पांच पचीस भई एक ठौरी, गावे दे दे तारी ॥ जरद कसबका लैहंगा सोहै, और कसुंमल सारी । कहे कवीर ऐसी होरी खेलो, निरतत सुषुमन नारी ॥

होरी २७—खेलो खेलो सुहागिनि होरी ॥ टेक ॥ चरण सरोज पिया हित जौलों, रजकी केशर घोरी ॥ भरम अबीर उडाव सखीरी, लोक लाज कुल तोरी ॥ सोहम् नार जहाँ रंग राची, बीच सुषुमना डोरी ॥ पुरुष पंच गली एक जानो, एकहि संग ढंढोरी ॥ शब्द सजीवन रुयाल पीवका, गहि लीजे निज डोरी ॥ रंग अनंग सखी मत राचो, पियके पांव परोरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, भिटे जमके झगरोरी ॥

होरी २८—पियके रंग रंगी कोई, मेरो काह करेगो ॥ टेक ॥ पिया मेरे सजनी मैं पियकी, पियके पांव परोरी । पियकी सेज