भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

सँवारत सजनी, सर्व सोहाग भरोरी ॥ कर सिगार मगन भई ठाठी, बिरहिन रूप खड़ी । साहब कवीर पिय पाये सजनी, सबको काज सरी ॥

होरी २९—कोई मोपै रंग न डारोरी, मैं तो भई हों बावरी ॥ टेक ॥ एक तो बौरी दूजी बिरहकी माती, तीजे नेह लगायोरी ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकारोरी ॥ पांच सखी मिल होरी खेलैं, और सुहागिन नाररी ॥ अपने पिया संग होरी खेलो, यही वसंत यही फागरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, आवागमन निवाररी ॥

होरी ३०—अहो मन सा मदमाती खेलो रंग भरी ॥ टेक ॥ आस पास सब सखी विराजें, ता बिच आप खड़ी ॥ चंचल चपल चातुरी बोलैं, नैनन सैन करी ॥ इन्द्रहि जाय आप बस कीन्हे, ब्रह्मा चले पराई । तिनहुं जाय काम बस कीन्हा, सकुच रहे सिरनाई ॥ शंकर ध्यान छूटे ना कबहुं, बहु बिध कीन्ह उपाई । देखो रूप मोहनी केरे, पीछे काम जगाई ॥ सुर नर किन्नर जच्छ गुनीजन, कोई धरे नहिं थीर । साहब कवीर आप अविगत है, माया जीत शरीर ॥

होरी ३१—आज पियाके मिलनको मैं गेंद भई ॥ टेक ॥ घरसों निकस अँगन भई ठाठी, ले चौगानमें डार दई ॥ ज्ञानकी गेंद सुरतको डंडा, जित चाहो तित ढरक गई । पांच पचीस खेलैया ठाढे, घाट बाट फिर रोक लई ॥ सतगुरु ढोला दियो शब्दके, तैंतीसोंके बस न भई । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निहाल भई जब हाथ लई ॥

होरी ३२—अहो सोई नार सयानी, प्रीतमके मन मानी ॥ टेक ॥ प्रीतम हमको पतिया पठाये, देखतही मुसकानी । पातीके बाँचत