कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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छाती जुड़ाई, रूपमें रूप समानी ॥ रंगमहलमें आय पुन वैठी, यही वस्तु निज जानी । गगन मंडलमें खेल रचो है, सोई देख ललचानी ॥ परमपुरुष अविगत अविनाशी, ताकी अकथ कहानी । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, शब्दमें सुरति समानी ॥
होरी ३३-सतसुकृत खेलैं होरी; अभय नगर अस्थान ॥ टेक ॥ इतसों आये ज्ञान लाडले, उतसों आई मन बौरी । त्रिबेनी तट खेल रचो है, खेलत हो हो होरी ॥ इतसे पांच सखी उठ धाई, कोह स्यामल कोह गोरी । त्रिगुन पिचकारी हाथ लिखे सब, खेलत हो हो होरी ॥ इत सों क्षमा सखी उठ धाई, शील सुमति दोड जोरी । प्रेम पिचकारी रंग रोस सहित, झगरत खेलत होरी ॥ ताल मृदंग झांझ डफ बाजे, अनहद शब्द करोरी । सुषुमन नारी राग अलापत, गावत मंगल होरी ॥ सुरति निरति द्वै मता बनाये, चलो अगम संग होरी । मेरुदंडके छप्पे चढके, खेलत हो हो होरी ॥ मूल कमलते रंग बढो है, बंकनाल निज ठोरी । सुरतिनाल चढ बाहिर आये, खेलत हो हो होरी ॥ खेलत खेलत जहां गयी है, सतगुरु शब्द किये सोरी । साहब कवीर दयानिधि सागर, खेलत हो हो होरी ॥
होरी ३४-होरी खेलैं संत सुजान, आतम राम सों ॥ टेक ॥ घरि घरि पल पल छिन छिन खेलैं, निस दिन आठों जाम ॥ योगी खेलैं योग ध्यानमें, दुनियां भूत पखान ॥ पंडित खेलैं चार वेदसे, मुलना किताब कुरान ॥ पतिबरता खेलैं अपने पिया संग, वेश्या सकल जहान ॥ महा प्रचंड तेज मायाको, सब जग मारा बान ॥ कामी खेलैं कामिनिके संग, लोभी खेलैं दाम ॥ साहब कवीर खेले संतनसों, और न काहू काम ॥
होरी ३५-मेरी उमर आई होरी खेलनकी, पिया मोसे मिलके बिछुर गयेरी ॥ टेक ॥ पिय हमारे हम पियकी पियारी, पिय मोसे