कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(६९४)
कवीरपंथी—
सँवारत सजनी, सर्व सोहाग भरोरी ॥ कर सिगार मगन भई ठाठी, बिरहिन रूप खड़ी । साहब कवीर पिय पाये सजनी, सबको काज सरी ॥
होरी २९—कोई मोपै रंग न डारोरी, मैं तो भई हों बावरी ॥ टेक ॥ एक तो बौरी दूजी बिरहकी माती, तीजे नेह लगायोरी ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकारोरी ॥ पांच सखी मिल होरी खेलैं, और सुहागिन नाररी ॥ अपने पिया संग होरी खेलो, यही वसंत यही फागरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, आवागमन निवाररी ॥
होरी ३०—अहो मन सा मदमाती खेलो रंग भरी ॥ टेक ॥ आस पास सब सखी विराजें, ता बिच आप खड़ी ॥ चंचल चपल चातुरी बोलैं, नैनन सैन करी ॥ इन्द्रहि जाय आप बस कीन्हे, ब्रह्मा चले पराई । तिनहुं जाय काम बस कीन्हा, सकुच रहे सिरनाई ॥ शंकर ध्यान छूटे ना कबहुं, बहु बिध कीन्ह उपाई । देखो रूप मोहनी केरे, पीछे काम जगाई ॥ सुर नर किन्नर जच्छ गुनीजन, कोई धरे नहिं थीर । साहब कवीर आप अविगत है, माया जीत शरीर ॥
होरी ३१—आज पियाके मिलनको मैं गेंद भई ॥ टेक ॥ घरसों निकस अँगन भई ठाठी, ले चौगानमें डार दई ॥ ज्ञानकी गेंद सुरतको डंडा, जित चाहो तित ढरक गई । पांच पचीस खेलैया ठाढे, घाट बाट फिर रोक लई ॥ सतगुरु ढोला दियो शब्दके, तैंतीसोंके बस न भई । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निहाल भई जब हाथ लई ॥
होरी ३२—अहो सोई नार सयानी, प्रीतमके मन मानी ॥ टेक ॥ प्रीतम हमको पतिया पठाये, देखतही मुसकानी । पातीके बाँचत
शब्दावली
(६९५)
छाती जुड़ाई, रूपमें रूप समानी ॥ रंगमहलमें आय पुन वैठी, यही वस्तु निज जानी । गगन मंडलमें खेल रचो है, सोई देख ललचानी ॥ परमपुरुष अविगत अविनाशी, ताकी अकथ कहानी । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, शब्दमें सुरति समानी ॥
होरी ३३-सतसुकृत खेलैं होरी; अभय नगर अस्थान ॥ टेक ॥ इतसों आये ज्ञान लाडले, उतसों आई मन बौरी । त्रिबेनी तट खेल रचो है, खेलत हो हो होरी ॥ इतसे पांच सखी उठ धाई, कोह स्यामल कोह गोरी । त्रिगुन पिचकारी हाथ लिखे सब, खेलत हो हो होरी ॥ इत सों क्षमा सखी उठ धाई, शील सुमति दोड जोरी । प्रेम पिचकारी रंग रोस सहित, झगरत खेलत होरी ॥ ताल मृदंग झांझ डफ बाजे, अनहद शब्द करोरी । सुषुमन नारी राग अलापत, गावत मंगल होरी ॥ सुरति निरति द्वै मता बनाये, चलो अगम संग होरी । मेरुदंडके छप्पे चढके, खेलत हो हो होरी ॥ मूल कमलते रंग बढो है, बंकनाल निज ठोरी । सुरतिनाल चढ बाहिर आये, खेलत हो हो होरी ॥ खेलत खेलत जहां गयी है, सतगुरु शब्द किये सोरी । साहब कवीर दयानिधि सागर, खेलत हो हो होरी ॥
होरी ३४-होरी खेलैं संत सुजान, आतम राम सों ॥ टेक ॥ घरि घरि पल पल छिन छिन खेलैं, निस दिन आठों जाम ॥ योगी खेलैं योग ध्यानमें, दुनियां भूत पखान ॥ पंडित खेलैं चार वेदसे, मुलना किताब कुरान ॥ पतिबरता खेलैं अपने पिया संग, वेश्या सकल जहान ॥ महा प्रचंड तेज मायाको, सब जग मारा बान ॥ कामी खेलैं कामिनिके संग, लोभी खेलैं दाम ॥ साहब कवीर खेले संतनसों, और न काहू काम ॥
होरी ३५-मेरी उमर आई होरी खेलनकी, पिया मोसे मिलके बिछुर गयेरी ॥ टेक ॥ पिय हमारे हम पियकी पियारी, पिय मोसे
(६९६)
कवीरपंथी-
अंतर कर गयेरी ॥ पिया मिलै तो जीऊं मोरी सजनी, पिय विन जियरा निकस गयेरी ॥ अबीर गुलाल लिये भर झोरी, पिय प्यारी संग रंग रहेरी ॥ धर्मदास बिरहिन पिय पाये, चरन कमल चित लाग रहेरी ॥
होरी ३६-प्रथम फाग वसंत पञ्चमी, सतगुरु मेहेर करोरी ॥ टेक ॥ अब पकडो छूटे नहिं कबहुँ, पियसों जाय मिलोरी ॥ प्रथम गुफामें बैठके सजनी, नाभी आड दईरी ॥ दूजे बंद कंठ ले छेदो, सूखी नाल भईरी ॥ करम भरमके बरुवा काटे, चेतन अगिन दईरी ॥ दियो जराय कुबुध कलेसको, उडके अकाश गईरी ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, केशर कीच भरोरी ॥ धीरज ध्यान प्रेम कुमकुमा, रंग सतसुधि न रहोरी ॥ आपहि खेल खेलारी साहब, आपहि ज्ञान गुनोरी ॥ दिना चार मायाको रूयालै, खेलत आप धनीरी ॥ इहँ उहँ बाहिर भीतर सबमें, जानै जान गुनीरी ॥ ज्ञान गुलाल लगावो सखीरी, सतगुरु संग चलोरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, एकहि फूल फुलोरी ॥
होरी ३७-या मन जालिम जोर रे, बरजो नहिं माने ॥ टेक ॥ निसि बासर सो चलत रहत है, सांझ गिनै नहिं भोररे ॥ कोटि जतन कर तनमें राखों, भागे सांकर तोररे ॥ सात द्वीप इकइस ब्रह्मांडलों, जहाँ लग याकी दोररे ॥ सुर नर मुनि औ पीर औलिया, काहू न पायो चोररे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेसुर कहिये, एहि कटे चित चोररे ॥ कहैं कवीर जुगतसे राखो, गुरु चरननकी बोररे ॥
होरी ३८-ये फागुन दिन चारी, होरी खेल मनारे ॥ टेक ॥ दया धरमको केशर घोरी, प्रेम प्रीति पिचकारी । बाजत ताल श्रुदंग झांझ डफ, अनहद धुनि झनकारी ॥ उड़त गुलाल लाल भये बादर, बरसत रंग अपारी । बीच बीच मुरली धुनि बाजे,
शब्दावली
(६९७)
रोम रोम लगी तारी ॥ दस दरवाजे घेर मन पकरो, डुरमति खैंच उतारी । घूंघुटके पट खोल गये हैं, लोक लाज सब झारी ॥ होरी खेल उलट घर आवे, सो तिरिया पिय प्यारी । कहैं कवीर टरे नहिं टारी, परम पुरुषकी नारी ॥
होरी ३९-फागुन आयो दुख देन सखीरी, मेरो पिया घर नाही ॥ टेक ॥ अपने अपने भवनसो निकसे कामिन कंथ । मेरो पिया परदेस सखीरी, मोको कैसे बसंत ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, का घसि लाँक अंग । सुध बुध मेरी गई सब सजनी, वाही पियाके संग ॥ तेरो पिया समीप सखीरी, तू तो हिलमिल खेल । नाहीं वर मेरोरी सजनी, गयो है ऊभी मेल ॥ एक संदेशा सुनरी सजनी, पिया घर आवैगे आज । दुबरी विरहिन भई बावरी, अजहुँ न आवे लाज ॥
होरी ४०-खेलो सइयां संग होरी, रंग भीनी पिया सों ॥ टेक ॥ निरगुन रूप लियो घट भीतर, मनसा हौदे भरोरी । चित चोवा बुध कैशर कहिये, भाव अरगजा घोरी ॥ शील संतोष ज्ञान उजियारो, पिचकारी भक्ति भरोरी । कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, जाते भाग जगोरी ॥
होरी ४१-फागुन मेरोरी मैं कैसे भरों दिन रैन ॥ टेक ॥ परकी फाग पिया संग खेली, अबीर गुलाल उड़ाय । आसोंकी फाग पिया घर नाही, खेलोंगी हमरी बलाय ॥ हमरे आंगन चंदनके बिरवा, जहैं चढ बोले काग । झूठे सगुन तुम्हार सखीरी, झूठे बनके काग ॥ उड़ उड़ काग सुलछना, जो पिय आवैगे आज । असी कोस मोरे पिया बसत हैं, सो कस आवैगे आज ॥ हमरे बालम फुलवारि लगाई, मृगा चुन चुन जाय । मारोंगी मृगा गुलेलसों, नयन कमान चढाय ॥ अपने बलमाको पतिया भेजों,
(६९८)
कवीरपंथी—
नयन कज्जल मसि लाय । बीच बीच बिरहा लिख भेजो, दुख सुख लिखो न जाय ॥ सतगुरु आये कंठ लगाये, मिट गइ तपन हमार । गुरु प्रताप ताप गई तनकी, धर्मनि कहें पुकार ॥
होरी ४२—मैं तो आन परी चोरनके नगर, सतसंग बिना जिव तरसे ॥ टेक ॥ हाथके हीरा डार दियो, का सूठी भरी कंकरसे । होरी खेलनकी यही बेर है, फिर चौरासी मंदिलसे ॥ अपने पिया संग होरी खेलों, और न काहू मनसे ॥ कहैं कवीर यह मोहिं लखाया, क्या छोड़ चले हो फिरसे ॥
होरी ४३—मैं तो अब कैसे खेलोंगी होरी, मोहि लागी शब्दकी डोरी ॥ टेक ॥ या होरीका सकल पसारा, लोग कहे थोरी थोरी ॥ होरी खेलो जो अपने पिया संग, या होरी मेरे अंग बयोरी । निश्चि दिन खेलों अपने पिया संग, दूटत नाहिं न डोरी ॥ धर्मदास सतगुरु सों माते, साहेब कवीर भ्रम तोरी ॥
होरी ४४—गुरु लाये मुक्तिके पान, प्रीतम आये हो ॥ टेक ॥ पान परवाना देत जीवनको, वे पावैं सुख धाम । चौदा लोक पर जोत निरंजन, तीन देव परमान ॥ तीरथ व्रत औ चार वेदमें, इनमें जगत भुलान । सात सुरतिके ऊपर कहिये, सोइ पुरुष पुरान ॥ सही छाप गुरु उहांसो लाये, समरथके फुरमान । सतयुगमें सतसुकृत कहिये, त्रेता सुनिंदर नाम । द्वापरमें करुणा-निध स्वामी, कलियुग कवीर निधान । कालको जीव कही नहिं माने, कोट सुने जो ज्ञान ॥ जैसे लाख अगिनमें पिघले, बिछुरत काठ समान । जे करतासे सब जग उपजो, भूले ठौर ठिकान ॥ जुगनके जुगनके बिछुरे हंसा, भेटे पुरुष पुरान । तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, दोऊ दीन ले पान ॥ राजा रंक सकल फिर आवे, छोड़ि कुल अभिमान । पांच हजार पांच सौ बीते, चलि है पंथ
शब्दावली
(६९९)
निशान ॥ घर घर सत्य शब्द जो फैले, सतजुग बरते आन । साहब कवीर आये निज घरसो, फगुवा दीन्हे नाम ॥ निरगुन भगतीरूप कलजुगमें, वेद मरम नहिं जान ॥
होरी ४५—मेरे मन परदेसी मीत, होरी खेलिये ॥ जब जैहो घर आपने, तब कौन तुम्हारे साथ ॥ टेक ॥ बाहिर खेलन नाहीं पैहो, आनि गहे जमराज । बांह पकर जम ले चले, धरी रहे सब साज ॥ जो तुम काज आपनो चाहो, नाम गहो बहु भांत । अजहुं चेत अचेत बावरे, जन्म सिरानो जात ॥ ज्ञान पुटरिया बांधके हो, सुरत अबीर उडाव । जाय लगे पियके हिये, अब खेलनको दाव ॥ पांच नार तुमको सजी, पांच हुए के जात । वे रस चाहें आपनी, अपनी अपनी भांत ॥ साहब कवीर होरी रचो, मचो कुलाहलसोर । समझ देख नरबावरे, येतो होरी कैसे मोर ॥
होरी ४६—तेरो है घर कंथ सुजान, खेलो रंग भरी । जनम जनमकी मिटी कल्पना, पायो जीवन प्रान ॥ टेक ॥ पांच सखी मिल मंगल गावैं गुरुगम शब्द बिचार । बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, उठत शब्द झनकार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके, तनकी तपन बुझान । पिचकारी छूटे अति अदभुत, रसके कीच बहान ॥ सतगुरु मिल आपा बिसरावैं, लागी खेल अपार । जित कित होहो होय रही, रटना लगी हमार ॥ सुख सागरमें न्हाइये, निरमल भये शरीर । आवागमन तब मेटिया, जब फगुवा पाये कवीर ॥
होरी ४७—तज काम क्रोध मद मोह होरी खेलिये ॥ टेक ॥ ज्यों पंकज जलमें रहे, जल नहिं परसत देह । उर माया मन परहरी, सतगुरुसे कर नेह ॥ ज्ञान सुगंध गोद भर लीजे, कुबुध गुलाल उड़ाय । सत्यनाम गुन गाइये, जश को डफ बजाय ॥
(७००)
कवीरपंथी—
मानुष जन्म डुरलभ है संतो, खेलो फाग सुभाव । कहैं कवीर चित् चेतो हंसा, बहुर न ऐसो दाव ॥
होरी ४८—मिल खेलो बिमल बसंत, प्यारे कंथसो । खोल अंधेरी कोठरी, मिल बैठो महल एकंत ॥ टेक ॥ गगन मंडल दीपक धरे महल करो उजियार । छैल छबीले कब मिलो, मेरे जीवन प्रान अधार ॥ गंग जसुनके अंतरे, चंद सूरके बीच । अर्ध उर्धके मध्यमें जहां मची अरगजा कीच ॥ बिन पग निरत होत है, बिन कर बाजे ताल । बिन नैनन छबि देखिये, बिना सरवन झनकार ॥ जहां सुरंग रंग रहो, हिल मिल एकहि ठांव । धर्मनि भेटे भावसों, गुरु पाये अपने नाव ॥
होरी ४९—खेलत फाग वसंत रैन दिन । सहज शुन्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति । त्रिकुटी महल रच्योरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले । सोहं सोहं सौरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि । अगम निगमकी झोरी ॥ मानो कोटि भान ससि ऊगे । जहां मनुवां विलमोरी ॥ सुरति सुहागिनी संग लिये मनुवां । दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि, ब्रह्म ज्ञान झकझोरी ॥
फाग प्रारम्भ ।
फाग १—मेरे सतगुरु आये आज खेलन फागरी । वानी बिमल सुगन सब बोले अति सुख मंगल रागरी ॥ टेक ॥ चाँचर सरस सखा संग बोले । अनहद बानी रागरी ॥ शब्द सुनत अनुराग होत है । कहा सोवे उठि जागरी ॥ पानी आदर पवन बिछौना । बहुत कहूं सन्मानरी ॥ देत अशीस अमर पद लेऊँ । अब चल युग युग राजरी ॥ चरन प्रच्छालि चरनोदक लेहु । उठि उनके
शब्दावली
(७०१)
पग लाग री॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । पीव अपने संग लाग री ॥ पांच अमृत भोजन लेवै । प्रेम प्रीति भरि थार री ॥ महा प्रसाद संत सुख पावे । आनि खुले मेरे भागरी॥ चौरासीकी बंध छुड़ावन । आये सतगुरु आपरी॥ पान प्रवाना देत जीवनको । वे पावैं सुख वास री॥ चोवा चंदन अरगजा कुमकुम । पुहुप माल गल हार री ॥ फगुवा माँगि मुक्ति फल लेवौं । जीव अपनेके काजरी॥ सोलहो सिंगार बत्तीसो आभरन । सुरति सिंगार सँवौररी॥ संत कवीर मिले सुख सागर । आवा गवन निवार री ॥
फाग २-मिलि खेलो विमल वसंत । प्यारे कँत सों ॥ खेली अंधेरी कोठरी मन । बैठो महल इकंत॥ टेक॥ गगन महल दीपक धरा हो । भवन कियो उजियार ॥ छैल छबीलौं ना छीपै । मेरे जीवन प्रानाधार ॥ विन पग नटवा निरति होत है । विन कर बाजे तार ॥ विन नैन जहाँ देखिये । विन श्रवण सुनि झन्कार॥ गढ़ जमुनके अंतर है । चंद सुरजके बीच॥ अरध उरधकी संधिमें । जहाँ मची अरगजा कीच ॥ रंग सुरंग रङ्ग रंगि रहे हो । हिलि मिली एकै ठाँह॥ धर्मनी भेटे भावसों हो । मिले पुरातम नाह॥
फाग ३-जहाँ मन पावे विसराम, संगति साधुकी । साधु संत मिलि होरी खेलो, निशि दिन आठों जाम ॥ टे०॥ होरी हरिको नाम है हो । लीजिये गाय बजाय ॥ फगवा बारह मास है हो । तुम मति विसरो ताहि ॥ पिचकारी नासा बनि हो । स्वासा कैसर रंग ॥ भरि भरि डारै सुषमना । धुनि अनहद ताल मृदंग॥ तीन रंग एकै भयो है । पीत श्याम अरु सेत॥ होरी खेले आत्मा । परमात्म कंत समेत॥ कवीर बलि गुरुदेवकी । पद परसत राजा राम॥ जापर दया भई सतगुरुकी । जुग जुग अविचल धाम॥३॥
(७०२)
कवीरपंथी-
फाग ४-करि सुमरन सुरंग होरी खेलिये हो । ज्ञान पिचकारी ध्यान केशर भरि ॥ या विधि मनको लहिये हो ॥ टे० ॥ पांच सखी मिलि उठि उठि धावै । इनकी लुकट बचइये हो ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह सब । अबीर गुलाल उड़इये हो ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । अनहद नाद बजइये हो ॥ सुरति निरति और राग रागिनी । अनचित चितसो गइये हो ॥ चोवा चंदन अरु अरगजा । रसकी कीच मचइये हो ॥ कहै कवीर तब साध कहावैं । गुरुसों फगुवा पइये हो ॥ ४ ॥
धमार प्रारम्भ ।
धमार १-नित मंगल होरी खेलिये हो । अहो मेरे संतो नितही वसंत नित फाग ॥ टेक ॥ दया धरमकी केशर घोरो । प्रेम प्रीति पिचकारी ॥ भाव भगत सों भरि सतगुरुको । सुफल जनम नर नारी ॥ छिमा अबीर चरच चित चंदन । सुमरन ध्यान धमारि ॥ ज्ञान गुलाल अगर कसतूरी । उमंगि उमंगि रंग डारि ॥ चरणामृत प्रसाद चरण रज । अपने शीश चढाय ॥ लोक लाज कुल कानि मेटिके । निर्भय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मग्न महोछब । करि संतनकी भीर ॥ कबहुँ ना काज विगड़ है तेरो । सत सत कहैं कवीर ॥ १ ॥
धमार २-कोई नाम सनेही खेले वसंत । अहो मेरे संतो कुलकी हो कानि निवारी ॥ टेक ॥ सत्संगति अरु दया भावसों । लागो प्रेम गुरु संग ॥ आसा मूल निराश विसारी । बाजत नाद मृदंग ॥ डिम कपट गुलाल उड़े जब । लागो रंग अपार ॥ पांच सखी मिलि मंगल गावे । लागि रही इक तार ॥ खेलन चली पंथ प्रीतमके । अति ही उलास आनंद ॥ भव विसारि कहु शंक न
शब्दावली
(७०३)
कीन्ही । सुरति शब्द गठि बंद ॥ चाचर रचि संग प्रीतमके । खुलिया ज्ञान भंडार ॥ पीवत नाम महारस छोके । निरखत रूप अपार ॥ कहैं सुने कछु वनती नाहि । जो खेले संत सुजान ॥ अजर अमर अविनाशी साहेब निर्भय नाम अमान । जरा मरण भय संशय छूटी । छाडचो विष संसार ॥ दास कवीर ऐसे खेलिये हो । आवागवन निवार ॥
धमार ३-निज नाम रंगीले रंग रंगे हो । अहो मेरे संतो छोड़ो हो कर्म अपार ॥ टेक ॥ छोड़ौ कनक कामनि बहु रंगा । याते कपट विकार ॥ जनम जनमके फंद कटत हैं । सतगुरु शब्द सम्हार ॥ जम पाटनको करम निवारो । हंस हो निरवान ॥ माया आस विचारि तजो जीव । बहुरि न भरम समान ॥ चेतो रे नर मूरख प्रानी । ये जम बड़ वरियार ॥ सार शब्द निश्चय उर धारो । भाग चले जम धार ॥ सत्सुकृतको निजकर सुमिरो । गहो अगमकी डोरि ॥ सतगुरु सेती परिचय पाइये । छूटचो जमको जोर ॥ पारस परस अमर घर पायो । हंस भये अस्थीर ॥ सदा करारी जुरा न व्यापे । ता रंग रंगे है कवीर ॥
धमार ४-कोई नाम रंगीले रंग रंगे हो । मेरे साधो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेम ते गगन परवावज बाजे । सुनिये छतीसों राग ॥ आवरन वरन गुलाल बहु रंगी । बहु रंगी पांचो राय ॥ बीस पांच अरु तीन सहेली । खेल त्रिकुटीमें आन ॥ अगर अबीर कुमकुमा केशर । अष्ट कमल परमान ॥ गगन मंडलमें खेलत हौं होरी । तत मता गल तान ॥ फगवा लेन भरली विधि आवो । पावे मुक्ति फल दान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । पांच पचीसों मारि ॥ नाम गहे ते परम पद पावे । पुनरपि जनम निवारि ॥
(७०४)
कवीरपंथी—
धमार ५—सतगुरुह संग होरी खेलिये हो । अहो मेरो साधो जाते जरा मरण भरमजाये॥ टेक॥ ध्यान जुगतकी करि पिचकारी । छमा चलावन हार ॥ आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे । पांच पचीस मंझारि ॥ ज्ञान गलीमें होरी खेले । मची प्रेमकी कीच ॥ लोभ मोह दोऊ कटि भागे । सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुटी महलमें बाजा बाजे । होत छतीसों राग ॥ सुरति सखी जहां देख तमाशा । सतगुरु खेलत फाग ॥ इंगला पिंगला सुषुम्ना हो । सुरति निरति दोउ नारि ॥ अपने पिया संग होरी खेलों । लज्जा कानि निवारि ॥ शुन्य शहरमें होत कुतूहल । करै राग अनुराग ॥ अपने पुरुषका दर्शन पावे । पूरन प्रेम सुहाग ॥ सतगुरु मिलि फगवा निज पायो । मारग दियो है लखाय ॥ कहै कवीर जो ये तत पावे । सो जीव लोक सिधाय ॥
धमार ६—ऐसे निर्गुण होली खेलिये हो । अहो मेरे साधो जहां पुरुष विसराम ॥ टेक ॥ मूल शब्दका बजै नगारा सहज उठे झन्कार ॥ असंख्य पाखंडीको लोक रच्यो है । बहु शोभा विस्तार ॥ वाकी आभा कायामें रहियो । गगन मंडलमें वास ॥ ताही सुमिरि हंसा पग धरिहो । काल न आवे पास ॥ निःअच्छर विहंगम जुग कीन्हा । वास धरै अस्थूल ॥ सब जीवन पर दया जु आई । प्रगट पुकारे मूल ॥ धरमदास तुम निज करि मानौ । यहि घर रहन हमार ॥ ऐसा मूल प्रताप जोरावर । चलत होय उजियार ॥ यहि प्रताप लोक पहुंचावै । सुरति निरति लिया साथ ॥ कहै कवीर सोई भल वंचै । मूल लेखा जिन हाथ ॥
धमार ७—ऐसे प्रभु संग होरी खेलिये हो । अहो मेरे साधो जैसे खेले हैं भुव प्रह्लाद ॥ टेक ॥ बालापन खेल खेलहि खोयो ।
शब्दावली
(७०५)
जवानीमें जोवन जोर ॥ यह मन भल कहो नहि माने । सांझ गिने नहीं भोर ॥ सनकसनंदन सुखदेव खेले । खेले शेष महेश ॥ कुलकुँ छाड़ि विभीषण खेले । कीन्हे हैं लंक नरेश ॥ अविनाशी संग विनसत नाहिं । जिनकी कथा अपार ॥ साधु ससुझि मूल गहि बैठे । सब जग लाग्यो डारि ॥ विरघ भयो कोइ नाम लैहै । ससुझि देख मन क्रूर ॥ निर्भय होरी खेल कवीर जी । घटहीमें हाल हजूर ॥
धमार ८—ऐसे खेलको कहा खेलिये हो । अहो मेरे साधो जामें आवागमन बसेर ॥ टे० ॥ निशि वासर जहाँ मिरतक व्यापे । भवसागरमें वास ॥ पांचों चोर छठो मन राजा । निश दिन करत विनास ॥ घर माटीको भीत झाँझरी । अष्ट धातको जडाव ॥ नव दरवाजे रहत मलीने । काहेको करत उपाव ॥ प्रकृति पचीसों संग जंजाली । काम क्रोध कोटवाल ॥ इतने कटकमें राजा भूलो । खेलत भरमको ख्याल ॥ भरम छोंड़ि अजहूँ किन चेतै । कहैं कवीर ससुझाय ॥ कहा हमारा जो कोइ माने । आवागवन नसाय ॥
धमार ९—अविनाशी दुलहा कवीर कब मिलिहो । अहो मेरो साधो सब संतनके रक्षपाल ॥ टेक ॥ जल उपजी जलसों नहि नेहा । रटत प्यास प्यास ॥ मैं विरहिनि ठाढी मग जोहूँ । राम तुम्हारी आस ॥ दिवस न भूख रैन नहीं निद्रा । गृह आँगन न सुहाय ॥ सेजरिया वैरन भई हमको । जागत रैन विहाय ॥ छांडया गेह नेह लाग्यो तुमसो । भयी चरन लवलीन ॥ तुम विनु जियरा यूँ तलफतु है । जैसे जल विनु मीन ॥ हमतो तुम्हारी दासीहो प्रभुजी । तुम हमरे भरतार ॥ दीन दयाल दयाकर आवो । साहिब सिरजन हार ॥ कै तो प्रान तजति हूँ साहेब । कै अपनी कर लेव ॥ दास कवीर विरह अति बाढी । हमको दर्शन देव ॥
कवीरपंथी शब्दावली २३
(७०६)
कवीरपंथी--
धमार १०—कैसे जीवेगी विरहनी पिया विनु हो । अहो मेरा साधो कीजे हो कौन उपाय ॥ टेक ॥ दिवस न भूख रैन नहीं सुख है । जैसे कलिजुग जाँम ॥ खेलत फाग छाड़ि चलि सुंदर । तजि चलि धन अरु धाम ॥ बन खंड जाय नाम लव लावो । मिलि पिया सुख पाय ॥ तलफत मीन विना जल जैसे । दर्शन दीजे हो धाम ॥ विना अकार रूप नहीं रेखा । कौन मिलेगा आय ॥ आपन पुरुष समुझिले सुन्दरी । देखो तन निरताय ॥ शब्दसरूपी जब पिया बुझो । छाड़ो भरमकी टेक ॥ कहै कवीर आन नहीं पूजा । जुग जुग हम तुम एक ॥
धमार ११—खेले तेरी माया मोहिनी हो । अहो मेरे साधो जिन जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ चंद्र वदन मृगलोचनी माया । विद्वैलो दियो है लिलार ॥ जती सती सब मोहि लियो है । गज गति वाकी है चाल ॥ हरे रंगकी चूँदरी हो । माया पहिरे ताही ॥ शोभा अद्भुत रूपकी हो । महिमा वरनि न जाय ॥ जेते तेते लिये हो । घँघुट माँहि समाय ॥ आजन वाकी रेख हो । अदग गयो नहीं कोय ॥ छिड़कत थोथे प्रेम सुमाया । भरि पिचकारी गात ॥ सनकसनंदन कहत है । औरकी केती बात ॥ अनहद ध्वनि बाजा बाजे हो । सरवन सुनत भयो चाव ॥ खेलन हारे खेलिहै हो । बहुरि न ऐसो दाव ॥ ज्ञान डगा षग रोपिया हो । टारचो टरत न पांव ॥ बाँस लिये कर आपने हो । फिरि फिरि झूत जाय ॥ ब्रह्मा शंकर वश कियो माया । दोऊ पकडे जाय ॥ फगुवा लीन्हो आपनो हो । बहुरि दियो छिटकाय ॥ नारदको सुख मोरिकै । माया लीन्हो बसन छुटाय ॥ गर्व गहेली गरबते हो । बहुरि चली मुसकाय ॥ सुर नर मुनि एक ओर भये हैं । एक अकेली आप ॥ सन्मुख कोऊ ना रहै हो । मारि लियो एक धाप ॥ इन्द्र सकुच
शब्दावली
(७०७)
ठाढे गढौ भयो हो । लोचन ललित अंजाय ॥ हरि अविनाशी उबरे हो । कहै कवीर गुण गाय ॥
धमार १२-भरम भुली माया जग मोहै हो । अहो मेरो साधो खेलत भ्रमको ख्याल ॥ टेका ॥ कटि केहरि गज गामिनी माया । संशय कियो सिंगार ॥ राखे रोकि सब मोह नदीमें कोऊ न उतरचो पार ॥ ब्रह्माको चित्त चोर लियोहै । शिवको लीन्हों साथ ॥ बस किय विष्णु विश्वके ठाकुर इंद्र नवायो माथ ॥ तैंतीस कोटि छले सुनि देवा । डारचो भरम गुलाल ॥ बरन फेरि अवरन होय नाची । ऐसी अलबेली नारि ॥ पंडित आविन आँजन आँज्यो । मूरख आँखिन धूरि ॥ जती सती सब बाँसन मारे सुरनर सुनि किय चूर । गोपीचंद भरथरी गोरख । खेलन आये फाग ॥ शृंगी ऋषि पाराशर लुटे ॥ छांडि छांडि वैराग ॥ सात दीप नौखंड तिहुपुर । फगवा सब सो लीन ॥ ठाढी विनती करै कबीरसों, हम तुमरे आधीन ॥
धमार १३-तुम दीन दस खेलों साजना हो । अहो मेरो सेतो बहुरि न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ रिनु वसंत माया संजोरी । कछुक करो अनुराग ॥ फिरि पीछे पछतावगे संतो बीति जायगी फाग ॥ ग्यान डगा तुम रोपि हो । सन्मुख रहो सम्हारि ॥ मारेगी चित्त चोरकै हो । मोहिनि चंचल नारि ॥ हरि सुभिरनकी गारी दीजै । गुरुकै वचन संम्हारि ॥ साधु संगति तुम जोरिकै हो । कबहुं न आवेगी हारि ॥ अनहद बाजा बाजे सखीरी । नौतम प्रीतम ठाय ॥ केशरि चरचो प्रेमकी हो । जुग जुग रंग न जाये ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो । तीन तीसको मारि ॥ नाम गहेते परम पद पड़ये । आवागमन निवारि ॥
धमार १४-कर मन संग भरमत केई जुग गये । अहो मेरो
(७०८)
कवीरपंथी-
साधो उपज्यो न केवल ज्ञान ॥ टेक ॥ कबहुँक बन चर तुम भये हो । कबहुँक तिन चर रूप ॥ कबहुँक सिंह दहारत वनमें । कबहुँक मीड़क कूप ॥ कबहुँक नरपति तुम भए हो । कबहुँक मांगत भीख ॥ कबहुँक गज होय घूमंत डोले । कबहुँक मस्तक लीख ॥ कबहुँक विकत तुम भयो हो । कबहुँक गये फँदे जंगल ॥ कबहुँक उड़िकै गये गगनकूँ । कबहुँ गये पाताल ॥ कबहुँक सुरपति तुम भये है । कबहुँक नरक निदान ॥ कहै कवीर ऐसे भरम डोले । जैसे सूकर स्वान ॥
धमार १५-ऐसे पिया संग होरी खेलिये हो । अहा मेरो साधो सुरति सुहागिन नारि ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखियनकी संगति तत मत सखी लिया साथ ॥ अरस परस पियाके संग राची । सहज लकुटिया हाथ ॥ गगन मंडलमें होत कुलाहल । उठत राग अनुराग ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । बहु विधि भयो सुहाग ॥ ग्यान गुलाल अनहद अरगजा । चित चोवां मन लाय ॥ कर-करनी केशरि रंग भीनी । विन रसना गुन गाथ ॥ धन सतगुरु धन साधुकी संगति । धन हमारे भाग ॥ सांची फाग भगति सतगुरुकी । कहै कवीर सुहाग ॥
धमार १६-अभि अंतर अनहद सुरली बाजे । अहो मेरो साधो चलो न देखन जाय ॥ टेक ॥ काया कुंज गली वृन्दावन । अनुभव जमुना नीर बैन वजाई बीचमें मोहन नाभि कमलके तीर ॥ सुधि बुधि विसार गई सब श्यामा । सुनि सुरलीकी टेरे ॥ उलटी सिंगार कियो है आतम । पहरचो है अम्बर फेर ॥ सुरलीको शब्द सुनत सब गोपी । भूलि गई परिवार ॥ पांच पचीस ॥ सखी संग राधो । भेटन चली है सुरार ॥ आस पास गोपियनको मंडप । विचि विचि परमानन्द ॥ भयो उछाह प्रेम अति
शब्दावली
(७०९)
वाटचो । ज्ञान उदय जिमि चंद ॥ थाके चंद सुरगुन मारुत । वहै न जमना नीर ॥ सुनि सुनिवरको ध्यान डिग्यो है । बछा न पीवै क्षीर ॥ घट घट रास रच्यो वृन्दावन । घट घट गोपी कान्ह ॥ घट घट राम रमे अविनाशी । जाने कोई संत सुजान ॥ सतगुरुके प्रताप सखीरी । वरनि सुनायो रास ॥ मानुष जन्म सुफल भयो साधो । विं धनि धरमदास ॥
धमार १७—अहो अविनाशी दूलहा कब मिलिहो हो ॥ हो भाई साधो मिलिहो सनेही आय ॥ टेक ॥ जल उपजे जलसो नहिं नेहा, रटत पियास पियास । मैं विरहिन ठाढी मग जोहों, पिया मिलनकी आस ॥ दिन नहिं चैन रैन नहिं निद्रा, घर अंगना न सोहाय । सेजरिया बैरन भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥ हूं तो तुम्हरी दासी साहब, तुम हमरे भरतार । दीन दयाल दया करो जन पर, साहब सिरजन हार ॥ आमिनकी बिनती सुन साहब, रहूं चरन लौ लीन ॥ तुम बिन जियरा ऐसे तलफे, जैसे जल बिन मीन ॥ की हम प्रान तजत हों साहब, की आपन कर लेव । साहब कवीर बिरह रस भोगी हमहूं को दर्शन देव ॥ १ ॥
धमार १८—अहो ऐसे गुरु संग, होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, जरा मरन भ्रम जाय ॥ ज्ञान जुगतकी कर पिचकारी, छमा चलावन हार । आतम ब्रह्म संग खेलन लागे, पांच पचीस मंझार ॥ ज्ञान गलीमें खेलैं होरी, मची प्रेमकी कीच । लोभ मोह दोउ कुटि कुटि मैं, सुनि सुनि शब्द अजीत ॥ त्रिकुट महलमें बाजा बाजे, हौ छतीसो राग । ज्ञान ध्यान दोउ देखै तमाशा, सतगुरु खेलैं फाग ॥ ईगला पिंगला सुषुमन रोको, सुरति निरति दोउ नार । अपने पिया संगहोरी खेलो, लजा कान निवार ॥ सुन्न महलमें होत कुतूहल, करहिं राग
(७१०)
कवीरपंथी—
अनुराग । अपने पियाके दरशन पाऊँ, पूरन प्रेम सुहाग ॥ सत-गुरु फगुवा पाइया हो, मारग दियो बताय । कहैं कवीर जो यह तत्त्व पावे, सो जन लोकहि जाय ॥
धमार १९—अहो साहब संग होरी खेलिये हो ॥ हो भाई साधो हो खेलो तन मन वार ॥ टेक ॥ धोखेकी एक होरी बनाई, भवको डाँढो गाड़ । दुबधा की जार लाय इत उतसों, लब्बाको देउंगी जार ॥ प्रेम पावक ले होरी दागों, कर्म बरूला डार । भावर दे दे मंगल गावों, त्रिगुण फंद निरवार ॥ ससुझकी झोरी सुमतिने पकरी, होरीकी भस्म लई झार । जित कित धूर उड़ाय जगत पै, कुल पर डारोंगी छार ॥ करनी को केशर घटमें घोरों, रहन करो पिचकार । परख पतंगके रङ्ग उतारों, देउंगी मन पर डार ॥ दया अबीर गुलाल धर्म कर, चित चंदन लेह गार । सतगुरु मुख पर डारों, प्रीतिसों, पाँचौ चोरन मार ॥ जो कछु चाल होय गुरु सप्रथ, पहिले देहु तिस्वार । आमिनकी बिनती सुन साहब, फगुवा देहु हमार ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर, अब है राह बिचार । अमी अंक परवाना पावै, पहुंचे पुरुष दुआर ॥
धमार २०—अहो बैरागी नागर होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, खेलो निरगुन नाह ॥ गढ बांधोंमें चाचर खेलै, निरगुन नाम विचार । संगन सनेह, हंस परबोधो, जमसो जीव उबार ॥ सूर सनेह गहो निशि बासर, सुषुप्त वेद टकसार । निरगुन नाम निअच्छर गावो, जुग जुग शब्द पुकार ॥ मंदिर-सों निकसी एक सुंदर, कर पग शीश न छंद । बिन नेनन देखिये वाकी सुरत, दिन दिन परम अनंद ॥ बिन जुगबंध काल छोड़े, बहु विधी भेष बनाय । जब लग जमकों चिरे न कागद,
शब्दावली
(७११)
काल धरी धरखाय ॥ पिंड न प्रान देह नहि सुंदर, विन रसना गुन गाय । ऋग यजु साम अथर्वण थाके, विन गुरु कौन लखाय ॥ जोजन तीन चले विन चरनो, करपलो परमान । सुर नर मुनि जाको मर्म न जाने, निरगुन चतुर सुजान ॥ तैंतीस कोटि देव नहि जाने, निरगुन भेद नियार । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, परख परख टकसार ॥
धमार २१—अहो करनाटक नागर होरी खेलैं हो हो ॥ हो भाई साधो हो खेलैं जो राय बंकेज ॥ टेक ॥ एक समय गज अस्थल आये, करनाटकके लोग । बिहँसि बिहँसि सब मंगल गावैं, बहुत करहिं सुख भोग ॥ राय बंकेज हंसनके राजा, गज अस्थल कडिहार । हंसन पार उतारहीं, परख परख टकसार ॥ हंस हंस युग बांधहीं, जम सों जीव छोडाय । सत्य शब्द दे लोक पठावैं, अभय निशान बजाय ॥ ज्ञान सुगंध धरो घट भीतर, कुबुधि अबीर उडाय । सुरति शब्द जीवनको दीन्हे, हंस लिये सुकताय ॥ भये लवलीन हंस सुकताहल, सतगुरु बांह चढाय । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, तबहिं अभय पद पाय ॥
धमार २२—अहो भर्म भारी माया जग मोहे हो हो ॥ हो भाई साधो हो जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ कटि केहरि गजगामिनि माया, संशय कियो सिंगार । रोक रही सब मोह नदी में, कोई न उतरे पार ॥ ब्रह्माके चित चोरी माया, शिवको लीन्ही साथ । बस कीन्ही बसुधाके ठाकुर, इंद्र नवावै माथ ॥ तैंतिस कोटि छले मुनि देवा, डारी बिरह गुलाल । बरन फेर अबरन होय नाचे, ऐसी अबला नार ॥ पंडित आंखिन अंजन दीन्हे, मूरखके सुख धूर । जती सती सब बांसन मारे, सुर नर मुनि किये चूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, आये खेलन फाग । शृंगीऋषि पाराशर
(७१२)
कवीरपंथी-
आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥
धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥
धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,
शब्दावली
(७१३)
भँवर गुफा निज वास ॥ गगन मंडलमें होरी खेलैँ, तत्त्व मता गलतान । फगुवा नाम लिये बन आवै, पावै मुक्ति फलदान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो, तीनों तापको मार । निगम ये जावो परमपद पावो, पूरन जन्म निवार ॥
धमार २५-अहो सतगुरु संग होरी खेलिये हो हो ॥ भाई साधो हो बहुर न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ खेलत हंस बंस कर लीन्है, मित गये विषय विकार । भाव रचेउ रंग संग निज पायो, खुलगये दशाहु दुवार ॥ गगन गुलाल उड़ाव रैन दिन, भर पिचकारी शील । खेलत हंस परमपद पावै, बिमल हंसनकी भीर ॥ गगन मंडलमें हंसा खेलै, चढे सवाया नूर । खेलै हंस सोहंगम डोरी, वर पाये भरपूर ॥ सोरह सुतका एक तत्त्व है, जासों न्यारा बीज । कहै कवीर हम निश दिन खेलैँ, सतगुरु दीन्हा चीज ॥
धमार २६-अहो नित मंगल होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, नितही बसंत नित फाग ॥ दया धरमकी केशर घोरो, प्रेम प्रीति पिचकार । भाव भक्ति भर भर सतगुरु सो, सुफल जनम नर नार ॥ छमा अगर छिरक चित चन्दन, सुमिरन ध्यान धमार ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, उमँग उमँग रंग डार । चरनामृत प्रसाद चरन रज, अपने शीश चढाय । लोक लाज कुल कान तोरके, निरभय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मगन महोत्सव, करे संतनकी भीर । कबहुँ न काज बिगरे नर तेरो, सतगुरु कहै कवीर ॥
धमार २७-मन रंगी राजा खेलै धमार ॥ काहूको पाताल पठावै, काहूको देत अकाश । काहूको बैकुंठ पठावै, फिर फिर नरकमें वास ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बांधे, माया रसरी डार । सुर नर मुनि सबहीको बांधे, कोइ न सके निरवार ॥ जोगी जती