भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

पांच सखी मिल संगल गावैं, सुषमन थार सँवार । चंद सूर दोउ दीपक बारैं, ब्रह्म जोत उनमुन उजियार ॥ मैं मेरे पियको नितउठ चाहों, जो पिया मोहिको चाहि । आवागमनके फेरे मिटावे, भौसागरमें बहुरि न आहि । शीलकी सेज सँवार महलमें, लौका सिंगार करोरी । साहब कबीर सुरत संयोग, ले, संतलोक गये रसभोगी ॥

होरी १०—कायानगरकी पौररी, मन खेलत होरी ॥ टेक ॥ सुरत ज्ञान डफ बाजन लागे, अनहदके घनघोर री । पांच पचीस बनिता बनि आयी, तेऊ रंगमें बोररी ॥ अबीर गुलाल हेत कर सजनी, प्रेमकी चाचर जोररी ॥ तन नारी औ मन है नारायन, प्रीतम अंग मरोररी ॥ खोल चुण्ट सन्मुख होय खेलो, होनी होय सो होयरी । कहैं कबीर औसर नहि पैहो, फगुवा लेउ न बोररी ॥

होरी ११—ऐसे खेलत फाग बसंत, निरंजन सहज सुन्नमें होरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, अगम निगमकी डोरी । मन एक भँवर कोकिला गुंजे, सोहैं सोहैं सोरी ॥ अष्टकमल दल भीतर मनुवां, त्रिकुटी महल रचोरी । कोटि भानु जगमग उजियारो, जहैं मनुवां बिलमोरी ॥ मानसरोवर हंसा डोलै, अति घन पुहुप फुलोरी । जरा मरनकी ससै मेटो, जाति बग्न बिसरोरी ॥ सुरति सोहागिन संग लिये मनुवां, हाथ सुमतिकी डोरी । कहैं कबीर मगन भई बिरहिनि, ब्रह्म जलमें झकझोरी ॥

होरी १२—तुम संतो खेलो संभारी, जग या होरी मच रही भौभारी ॥ टेक ॥ जड चेतन दो रूप बनाये, एक कनक दूजी नारी । पांच पचीस लिये संग अबला, हँस हँस मिल गावैं गारी ॥ दुरमति डिंभ गहे करमें डफ, हों बड हों बड दे तारी । त्रिगुन तार तमूरा बाजे, आशा तृष्णा गत न्यारी ॥ चोवा चंदन अबीर