कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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अरगजा, मायाकी गागर भारी। षट् दृशन् पाखंड छानबे, पकर किये सब बेगारी॥ लोभ मोह दोउ भर पिचकारी, छूटत है बारं बारी। जो कोइ सनमुख होयके खेले, उनको छींट लगी कारी॥ कुमति गुलाल डाल मुख मींड़े, काम कला पुटरी मारी। सुर नर मुनि औ पीर औलिया, भीज रहे सब संसारी॥ चतुरन फगुवा दे दे छूटे, मूरखको लगी प्यारी। कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरगुन ज्ञान गली न्यारी॥
होरी १३-ऐसी खेलत फाग सबै नारी, जाके हाथ लकूट मुखमें गारी॥ टेक॥ ग्रिह ग्रिह ते निकसी बनि सुंदरि, भांतिन भांति पहिर सारी। अबिर गुलाल लिये भरझोरी, मिलन चलीं पियको प्यारी॥ अपने अपने झुंडसों निकसीं, गावत तरुन ब्रिध बारी। बैठीं जाय हरिमंदिरमें जहां, बैठे वर मूरत धारी॥ एकन मूठी चोवा चंदन चरचे, एकन मूठी भर मारी॥ एक खड़े सनमुख कर जोरे, एकन हाथ चैंवर डारी। को बोले को चितवे कासों, निरजीव रूप कहो कारी॥ निहुर निहुरके पांय परत हैं, ये देखो अचरज भारी। सबै सहेलरी मुरक चली हैं, कोई न संग गई प्यारी॥ आपहिं नर नारी होय बैठे, प्रान पियाकी गत न्यारी॥ ये सब भर्म छोड़ दे बौरी, अबकी जन्म जुवा हारी। कहैं कवीर अपनपौ खोजो, सुखसागर सुखकी बयारी॥
होरी १४-अब कहां जात बेदरदा हो, मोपे गरदा झारके॥ टेक॥ आये बसंत सबै बन फूले, बन बन हो गये जरदा। जबसे लागी बसंत पंचमी, सब बन होगये मरदा। लोक लाज कुल कान बिसर गई, अंदर खुल गई परदा॥ चलोरी सखी मिल चौसर खेले, पासा परगये नरदा। कहे कवीर सुनो भाई साधू, गुरु चरननकी सरधा॥