कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मन भाया । औलिया अंविया गौस कुतब, या सब मिल रंग बनाया ॥ ध्यान मौलासे लगाया ॥
होरी २६-मेरे साहब आवन हार, होरी खेलोंगी ॥ करनीके कलस संजोय सकल विध प्रीत पांवडे डार । चरन पस्वार चरनामृत लेहौं, मनकी मनी उतार ॥ तन मन धन सब अरपन करिहौं, बहु विधि आरती साज । प्रेम मगन होय मंगल गावों, बिसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूर उडाव शरीरसो, ज्ञान गुलाल प्रकास । पारस पान लेवे सतगुरु सो, मेट दूसरी आस ॥ दया धर्म तन केशर घोरों, भाव भगति पिचकार । सत सुकृत अवीर अरगजा, देउंगी पिया पर डार ॥ साहब कवीर मिले मोहि सतगुरु, फगुवा दीन्हो नाम । आवागमनकी मेट कल्पना, पायो आनन्द धाम ॥
होरी ८-मेरे सतगुरु दीन दयाल, प्रीतम आयो हो ॥ टेका ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, अधम उधारन नाम । बंदीछोर मुक्तिके दाता, परम सनेही नाम ॥ साधु सन्त औ अति अभिलाषा, सब विधि पूरण काम ॥ जैसे चात्रिक स्वातिबूंको रटत है आठों जाम ॥ जिनकी सुरत लगी सतगुरु सों, बिसरे सुख ग्रह धाम । सतगुरु दया करत जीवन पर, देकर अविचल विश्राम ॥ आनंद मंगल उचार परम सुख, अमर कहत है जीव । सुमिरन दे सतलोक पठाये, ऐसे समरथ पीव । चरन कमल सतगुरुके सेऊं, मन चित दे अनुराग । कहैं कवीर ऐसी होरी खेले, जाके पूरन भाग ॥
होरी ९-होरी खेलत लालनके संग प्यारी, हम देखी सुसक्यान ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकार । क्षमा केशर ले छिरकन आई, सुरति-सोहागिन अविगतनार ॥