भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६८२)

कवीरपंथी—

सुख आनंद सब होरी खेलो । काल कठन भरम भयो हरी ॥ कुलकौ त्याग मान सब तोरी । कहैं कवीर पिया संग होरी ॥

होरी ११—हरि होरि हो हरि होरी । हरि होरि मैं हरि होरी ॥ कोई साधु संत खेलैं होरी । सतनामको डांडो रोप्यौ धरम धजा गहि जोरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मुदंग झांझ डफ । नाचत है तन मन तोरी ॥ वंसी बीन अनहद धुनि बाजे । जसि मति सुमति नाचे गोरी ॥ चोवा चंदन और कुमकुमा । अबीर लिये भरि भरि झोरी ॥ उडत गुलाल विसाल लाल रंग । रंग रही गगन गरक गोरी ॥ जब अंतर पट गांठि दइही । अब पायो है पट जोरी ॥ कहैं कवीर अखंडित फगुवा । जुग जुग पावो मति मोरी ॥

होरी १२—सतगुरु संग रचि है धमारि होरी मैं खेलूंगी ॥ टेक ॥ साधु संत मिलि मंगल गावें । लगी शब्दकी मार ॥ उडत गुलाल अरुन भयो अंबर । प्रेमकी परत फुहार ॥ चोवा चंदन और अरगजा । पिचकारिनकी मार ॥ दास कवीर स्वामी निरगुन गावे । संतो लेहु विचार ॥

होरी १३—मेरे सतगुरु दियो बताय मारग नामका ॥ नाम नाम करि जाये पहुँच । पाय अभय पद धामका ॥ टेक ॥ वा मारग मोहि ले चलि सजनी । जहां पियाको देस ॥ परसों चरन कमल नागरके । मेरो रहै सुहाग हमेश ॥ आयो फाग वसंत सखीरी । फूले आंब पलास ॥ कली कली कलियाँ खुली । सब संतन भयो विलास पांच पटे लनि खेलन निकसीं । सखी पचीसों साथ ॥ खेलै फाग वसंत पांच मिलि । अपने अपने हाथ ॥ ज्ञान गुलाल करनी करो । अन भौ करो अबीर ॥ अमृत पिचकारी भरो प्रेमसे । छिड़को सकल शरीर ॥ मैं हारी पीया मारग पायो । ले सतगुरुकी रीति ॥ कहैं कवीर सतलोक पहुँचे । साहेबकी प्रतीति ॥