कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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होरी १४-प्रीतम आइया हो मेरे सतगुरु दीन दयाल ॥ टेक ॥ बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । परम सनेही नाम ॥ साधु संतसो अति अभिलाषा सब विधि पूरन काम ॥ जैसे चातक स्वाति बुन्दको । रटत है आठों जाम ॥ जाकी सुरति लगी सतगुरुसे । विसरी सुखके धाम ॥ आनंद मंगलचार परम सुख । अमर करत है जीव ॥ सुमिरनदे सतलोक पठाये । ऐसे समरथ पीव ॥ चरन कमल सतगुरुकी सेवा । मन चित्ते अजुराग ॥ कहै कबीर ऐसी होरी खेले । जाके पूरन भाग ॥
होरी १५-ये होरी खेलूंगी मेरे साहेब आवेंगे आज ॥ हंस उबारन जीव निसतारन अधम उधारन नाम ॥ टेक ॥ करनी कलश से जोय सकल विधि । प्रीति पात्रदे डारि ॥ चरण प्रछालि चरणाभूत लेऊँ । मनकी मनी उतारि ॥ तन मन धन सब अरपन करिहुँ बहु विधि आरति साजि ॥ प्रेम मगन होय मंगल गाऊँ विसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूरि उड़ाय शरीरते ज्ञान गुलाल प्रकास ॥ पारस पान लेऊँ प्रीतमसों मेटि दूसरी आस ॥ दया धरमकी केसरि घोरों भाव भक्ति पिचकार ॥ सत सुकृत दोउ अबीर अरगजा देऊँ पिया पै डार ॥ साहेब कबीर मोहि मिले सतगुरु फगुवा दीनों है नाम ॥ आवागमनकी मिटि कलपना पाये सुखकी धाम ॥
होरी १६-होरी होरी रंग बोरी विरहा झकोरि मारी ॥ टेक ॥ चौवा चाल अरगजा रहनी करनी केसर घोरि ॥ प्रेम प्रीतिसों भरि पिचकारी हूंम हूंम रंगी सारी हमारी ॥ बाजत ताल मृदंग बिना कर बीना शब्द रसाली ॥ खेलत है कोइ सुघर खेलैया योग जुगति लगि तारी हमारी ॥ इंगला पिंगला रास रच्यो है सुखमनि बाट बुहारी ॥ सुरति निरति दोउ नाचन लागी बढयो रंग रति