भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६८१)

गोरी ॥ जहाँ चतुर सखी नित गावहिं । बाजत वूर देत तारी ॥ सुर नर मुनि सब करत कौतूहल । ग्यान गुलाल उडत भारी ॥ कोइ निरगुन कोई सरगुन राचे । आप आप विसरे सबही ॥ कहैं कवीर चेत नर प्रानी । शब्द सरूप मिलै अबहीं ॥

होरी ८—म्हारको खेले ऐसी होरी । जामें आवा गवनकी है डोरी ॥ टेक ॥ श्रवन न सुनयो नैन नहीं देख्यो । पीया पीया लागि रही लौरी ॥ पंथ निहारत जनम सिरानो । प्रगट मिल्यो नहीं चोरी ॥ जा कारन गृह तजिकै निकसी । लोक लाज कुलकी तोडी ॥ चोवा चंदन अगर कुमकुमा का पर डारों रंग रोरी ॥ येकन तो मृगछाला वोडी येकन गुदरी अरु झोरी ॥ येकन बहु विधि स्वांग बनायी । लोगन लागी ठगोरी ॥ जगन्नाथ बढ़ी रामेश्वर । देश देशान्तर सब दौरी ॥ अरसठ तीरथ पृथ्वी प्रदक्षिना । पुहकर हूमें लट बौरी ॥ वेद पुरान भागवत गीता । चारिउवरन दंडोरी ॥ कहैं कवीर सद्वरु दया बिन । भरम न मिटि है ये बौरी ॥

होरी ९—आवो पीया संग खेलो होरी । सुरति शब्द सो लो जोरी ॥ टेक ॥ नाना रंग सबै बनि आवौ । ग्यान गुलाल भरे झोरी ॥ चित चरचा चंदन मन लावौ । केसरि भरि पिचकारी ॥ प्रेम प्रीति प्रकास परम गुरु । सत सुकृत वर पायोरी ॥ तब मन थिर भयो थिति पाई । आदि अंत दीप लायोरी ॥ तत पद सार संगति सतगुरुकी । कहैं कवीर सम आयोरी ॥

होरी १०—आओ पीया संग खेलो होरी । सुमति सखी मुनि मुनि दौरी ॥ टे० ॥ करम जंजीर काटि सतगुरु सब । जरा मरनको गयो भौरी ॥ सत संतोष शील मति थिर होय । खेलो फाग विचारोरी ॥ अग्र अमी अबीर ले आओ । काम क्रोध तजि दोउरी ॥ भाव भक्ति अरु सही सलामति । सो पद पायो नाम उधोरी ॥