कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
पियाकी प्यारी ॥ अपने अपने झुंडन मिलिकै । गावत ब्रिघ तरुन बारी ॥ पहुँची जाय जहां हरि मन्दिर । बर बैठे मूरति धारी ॥ एकनि चंदन केसरि छिडकै । एकनि मुट्टी भरि भरि डारी ॥ एक सन्मुख ठाढी कर जोडै । एकनि हाथ चँवर ढारी ॥ को चितवै को बोलै कासों । निजीव रूप कहुँ कारी ॥ निहुरि निहुरि सब पांव पडत हैं । यह देखो अचरज भारी ॥ सब सहेली बहुरि चली घर । कोई न संग रही प्यारी ॥ आपु नहीं भुले नर नारी । प्रान पियाकी गति न्यारी ॥ यह सब भरम छाडिदे वारी । अब जिन जन्म जुवा हारी ॥ कहैं कवीर अपनपौ चीन्हो । सुखसागरमें सुखकारी ॥
होरी ६-जग होरी मच रही है भारी । तुम संतो खेलौ संसारी ॥ टेक ॥ जड़ चैतन दोऊ रूप बनाये एक कनक दूजी नारी ॥ पांच पचीस संग लियै अबला हँसि हँसि मिलि गावै गारी ॥ डिम्भ कपट लिये करमें डफ हूँबड हूँबडकी तारी ॥ त्रिगुन ताल तबला बाजे आसा तूछना गति न्यारी ॥ पाप पुन्य दोऊ भरि पिचकारी छूटत है बारंबारी ॥ सन्मुख होय करि जो वह खेले, ताके छीट लगी कारी । चोवा चंदन अबीर अरगजा माथकी गार भरी ॥ षट दर्शन पाखण्ड छीयानवे पकडि किये सब वेगारी ॥ कुमति गुलाल डारि मुख मीडै काम कला पुटरी मारी ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया भजि रही सब संसारी ॥ चतुरा फगुवा देदे छुटे मूरखको लागे प्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू निर्गुन ग्यान गली न्यारी ॥
होरी ७-ऐसे खेले संत सदा होरी । जहां दुंद उपाधि नहीं कोरी ॥ टेक ॥ ताल मूल सुर साधि बाट घर । पश्चिम दिशा चढ़ि गहि डोरी ॥ खुले कपाट सहज घर पावों । सुंदर रूप सुरति