भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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डफ वीना, करम भरम बाजे करतार । अधर्म धर्म गावे राग रागिनी, मोह लियो सगरो संसार ॥ आसा मनसा संग सहेली, बडी अपरबल तीनऊँ नारी । वास लिये धावत जित तित ते, सुर नर मुनि डारे पछारि ॥ त्रिविधि तापकी कठिन ठगौरी, अपनी अपनी करत रारि । नाचत मन संग लिये इंद्रीयन, उपजावत अति विषय विकार ॥ आये विवेक ज्ञान संग लिये, सत शब्द गावे धमारि । शील संतोष भरि प्रेम पिचकारी, मदन मस्त को दियो बिगारि ॥ पांच पचीस खेले निरभय होय, हिल मिलिकै ये नौ सारी । रटना लगि सबै ये गावे, प्रेम आनंद होय मंगल चारी ॥ मिलि सतगुरु जहां होरी खेलेँ, आवागवन को दुख निवारि । कहैं कवीर छोड़ि भवसागर, बहुरि न आवे या संसार ॥

होरी ४—मन राजा खेलन चले रंग होरी हो । काया नगर मंझार राम रंग होरी हो ॥ टेक ॥ पांच पचीस मिलि खेलहि रंग होरी हो ॥ मन राजा सरदार राम रंग होरी हो ॥ इंगला पिंगला सुषुमना रंग होरी हो ॥ तिरवेनीके घाट राम रंग होरी हो ॥ ग्यान गली ठाढे भये रंग होरी हो ॥ सुरति निरति दोउ लार राम रंग होरी हो ॥ सील छमा छिडकत फिरे रंग होरी हो ॥ बाढचो रंग अपार राम रंग होरी हो ॥ मेर डंड छाजे चढों रंग होरी हो ॥ डडता प्रेम गुलाल राम रंग होरी हो ॥ अनहद बाजा बाजई बाजहि रंग होरी हो ॥ निरति करें सब नारि राम रंग होरी हो ॥ दास कवीर जहां खेलहि रंग होरी हो ॥ अविनासीके संग राम रंग होरी हो ॥

होरी ५—ऐसे खेलत फाग सबे नारी । जाके हाथ लकुटिया मुख गारी ॥ टेक ॥ यह यहते निकसी वन सुन्दर । भांति भांति पहरे सारी ॥ अबीर गुलाल लिये भरि झोरी । मिलन चली