कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 968 में से
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परमतत्त्व पदुमनाभ, परिचय लह्यो ॥ ३ ॥ नौ करोर प्रह्लाद अष्टध्रुव लक्षमन हनुमाना । मोरध्वज हरिचन्द, सातले संत- स्याना ॥ रुक्मांगद अम्बरीष पंच, निज पहुँचे दासा । दौय अर्जुन गंगदेव, दौय वृजमंडल वासा ॥ तैतीस कोट तिहु जुगमें हरि सेवत निरभय भयो । कलियुग नाम कवीर हैं, अनन्त कोट जिवले निस्तन्यो ॥ ४ ॥
छप्पय (भक्तमालका)
कबीर कानि राखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥ भक्ति विखुरख जो धर्म सब, अधर्म करि गायो । जोग जग्य व्रतदान, भजन विनु तुच्छ दिखायो ॥ हिंदू तुरुक प्रमान, रमैनी शब्दे साखी । पक्षपात नहीं करी, सबनके हितकी भाखी ॥ आरुठ दशा होय जगतमें, मुख देखी नाहि न भनी । कबीरकानराखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥५॥ राखी नहीं जगतकी, भाखी सत्य कबीर । देदे शब्द निराटका, तोरे भ्रम जंजीर ॥ बानी अरबो खरब है, ग्रन्थां कोटि हजार । करता पुरुष कबीर है, नाभा किया विचार ॥ ६ ॥
इति छप्पय
(सूचना—यहांतक तो नाभाजीके नामसे है जिसमेंसे केवल एक छप्पय “कबीर कानि राखी नहीं” वाला शुद्धभी है और भक्तमालमें पाया भी जाता है । शेष छन्दोभंग आदि अशुद्धि- योंसे ऐसा पूर्ण है कि, इसे इस रूपमें नाभाजीकी कविता कहना महा अन्याय होगा । यह तो यह इन्हीं छप्पयोंके आगे एक दोहा है—
जनक विदेही नानका, ऊधो स्याम शरीर । वालमीक तुलसी भये, शुक्रदेव भये कवीर ॥
नोट—३२ पेजमें, नाभाजीकृत छप्पय में ‘अधिकारी’ के आगे एक चरण ग्रन्थ पात है.