भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

विचार-पाठक ! इन छप्पयोंसे देखिये जिनमें कवीर साहब-को किन किनकी ऊपमा दी गयी है । अस्तु उन्हें रहने दीजिये वे तो उपमा मात्र हैं, अंतिम साखी को देखिये-इसमें कवीर साहबको शुक्रदेवका अवतार बतलाया गया है, अब विचारिये कवीर साहबका यह वचन—"अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मझौराहो" कहाँ-यह बात । तिसपरभी ऐसीही बातोंसे भरी पुस्तकको लोगोंने "सद्गुरु कवीर साहब कृत" छापकर पब्लिकको धोकामें डाला है और कवीर साहबके नाम पर धब्बा लगाया है । इस विषयमें विशेष किसीको जानना हो तो वह, कवीर चन्द्रोदयमें छपे "निष्कलंकमें कलंक" नामक लेखको पढकर खातरी कर सकते हैं ! यहाँ विशेष लिखनेका अवकाश नहीं हैं । और मैंने इसमें इन वाणियोंको कवीरपंथियों-को सचेत करनेके लिये रक्खा है ॥ ]

॥ स्तोत्र अष्टक ॥

( मंगल रूप अनूपम् पूरण )

मंगल रूप अनूपम् पूरण, नाम कवीर सो आप उदारा । मो पर दृष्टिदया करि हेरहु, हौ अति बालक दास तुम्हारा ॥ काम अपार महा बल भारत, देखतही मम चित्त डरावे । कीजे कृपा उर अन्तर्यामिसु, संकटसे बहु जीव दुखावे ॥ १ ॥ लोभ महा मद क्रोध उपावत, होत अधीर बहु चितमेरो । मोह गया ममता रजनीवत, बारम्बार रहे नित घेरो ॥ एक उपाय यही बचवे अब, होहु दयाल दया करि हेरो । कहा कहौं कछु आपछिपेन्हि, हौ प्रभुनाथ अनाथन केरो ॥ २ ॥ मो कहैं तात तुही पितु मातु सु, और उपाय नहीं कछु मोहीं । जो सुत मातु पिता ढिगआवत,

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