कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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छन्द-समुद्भि देखु चित त्यागि, नास्ति सुखजो अनित्य पाग, गुरु चरणन करु संगति, संत साधुकी ॥ हो मिस्कीन, राखु निश्चय याकीन, तू तो जमापद बाकी खर्च काहे आबादकी ॥ मनमनसा दोऊ लौडि निकारिडारो, मारो हंकारतृष्णाकुबुद्धि कुबादकी ॥ रूप हंस धार, ठहरि कीजिये विचार, यार बफादार दीनानाथ, दीनबंधु गुरु साधुकी ॥ ८ ॥
॥ शब्द अष्टपदी ॥
प्रभुजी तुम विन कौन छुडावे ॥
महा कठिन यमजाल फाँस है तासों कौन बचावे ॥ १ ॥ नाना फाँस फँसाय जीवको, अपने रूप छिपावे ॥ पंच कोश है परगट ग्रासे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपुहि एक अनेक कहावे, त्रिविधि रूप बनावे ॥ सन्निपात होय दुष्ट नष्ट सो, परलय अंत दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत अरुझावे, जहाँ तहाँ भटकावे ॥ योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति अटकावे ॥ ४ ॥ आस नाम नौका बैठावे, भवकी धार बहावे ॥ तत्त्वमसी कहि ताहि डुबावे, अंत कोइ नहीं पावे ॥ ५ ॥ चारि मुक्ति जोइन चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे ॥ नेम धर्म पूजा औ संजम, बहुविधि लागि लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को पावे, जीवहिं चैन न आवे ॥ चार वेद षट अष्टदशों लों, शून्यहि शून्य समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पत्ति परलय, जीव दुसह दुख पावे ॥ साहेब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥ ९ ॥
दोहा ।
सुख साहेब सुखरूप जो, हरन कालके पीर ॥ जो जन आवे शरणमें; परखि लगायउ तीर ॥ १० ॥ करुणार्णव कृपाल गुरु, सुखनिधान दुखभूर ॥ बन्दीछोर अशरण शरण, परख प्रकाश निजमूर ॥ ११ ॥ जीवनके दुख मेटिया, परखाये सब जाल ॥ ताते गुरु तुव नाम