कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
यह, बन्दीछोर दयाल ॥ १२ ॥ अशरण शरण नाम तुव, बरणत हैं सब संत ॥ ताते गुरु न विसारिये, परखायो जीव आंत ॥ १३ ॥ जो गुरु बसे बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर ॥ बिसराये बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर ॥ १४ ॥ गुरु उपमा क्या दीजिये, पटतर नहीं कोय ॥ पलक पलक कई बंदगी, छिन छिन निरखों सोय ॥ १५ ॥ जो तू चाहे मुझको, छोड़ सकलकी आस ॥ मुझही ऐसा है रहो, सब सुख तेरे पास ॥ १६ ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय ॥ शरण आय यमसे बचे, आवा-गवन न होय ॥ १७ ॥ दयाकरन अवगुण हरण, तारण तरण उदार ॥ अशरण शरण बन्दों चरण, तुम विन नहीं निस्तार ॥ १८ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके हाथ ॥ त्रसित गहेऊँ साहेब शरण, भवभय हारि सनाथ ॥ १९ ॥ प्रभु सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान ॥ लोह कनक पारस करे, साहेब शरण समान ॥ २० ॥ बन्दों चरण सब दुख हरण, प्रभु प्रसाद दुख धूरि ॥ दयाकरी सब दुख हरी, संसृति झूल भौ दूरि ॥ २१ ॥ बहे बहाये जात थे, भव सागरके माहिं ॥ दयाकरी परखाय सब, झरणाये गहिं बाहिं ॥ २२ ॥ संतत अभय गुरुकी शरण, सदा परख परकास ॥ शमन सबै भव जाल तम, रामरहस सुखबास ॥ २३ ॥ सर्वोपरि गुरुके चरण, जो हारी भव खेद ॥ परम उदार सागर दया, थाह न पावे वेद ॥ २४ ॥ चारि वेद जग विदित हैं, ब्रह्मा कीन्ह प्रकास ॥ चारि रूपसो जानिये, चारि अवस्था भास ॥ २५ ॥ भास मिटावे जीवको, काटे यमके फंद ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, संशय खंडे द्वंद ॥ २६ ॥