भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(७१)

छन्द.

साहेव स्वतः प्रकाश पारख, त्रास नहीं यम दंडके ॥ वास शरण बिलास तजि, सब आस पिंड ब्रह्मांडके ॥ गांस फांस मिटाय दास, हुलास ज्ञान अखंडके ॥ नहीं नाश ते इतिहास सुनि, सो आदि अंत प्रचंडके ॥ यम हंत एक अनंत, तेहिके फांस बहु वर्णतके ॥ बहु जंत गाई हरंत, कूप पंतत बहुते गनंतके ॥ सब दास होई रहंत, दुष्ट पंत चीन्ह न कंतके ॥ आदि अंत जे मुनहि संत, नहीं धावहि सो बेअंतके ॥ जीव हाल कीन्ह बेहाल, काल कराल सुनि अवजालके ॥ उरसाल अनेकन्हि भाल, सो बाचाल कवितन गालके ॥ तेहि टाल डाल प्रचंड होहु, निहाल नाल कृपालके ॥ लहू परख माला माल भेटि, भव जाल शरण दयालके ॥ यह बुदबुदा जो शरीर, नीर न थीर झूठाहीरके ॥ परपंच बहु ततबीर, तेहिके बीर उबरे हीरके ॥ तजु ललनि कीर फकीर, जेहि डर नहीं वजीर अमीरके ॥ गुरु पीर हरे भवभीर, अभय गंभीर शरण कबीरके ॥ नारदादि शुकादि लै, ब्रह्मादि सब जेहि गावहीं ॥ गाइ धाइ हेराइ, बारम्बार मन पछतावहीं ॥ जस जस जतन छूटन करहीं, भव बूड़े थाह न पावहीं ॥ सोई धार कठिन अंधार, ते गहि पार पारख लावहीं ॥ २७ ॥

दोहा —

संतत सुख है परखमें, साधन जतन बिनास । भूलि भटकि मति जाहु जिय, विविध कर्मके फांस ॥

अर्जनामा अष्टक -

हौं सेवक अज्ञान मोपर दया दृष्टि निहारिये ॥ बाल जानि कृपालु मोको सुरतिमें नहीं टारिये ॥ हौं निपट बुद्धि मलीन जगत आधीन मै ताते भयो ॥ जो होय तुव पद लीन सोई विपिन मन काहे न रह्यो ॥ १ ॥ यह जगत जाल कराल मोह