भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(७५)

पाखंडरूप विकार तजेंगे ॥ होय सुखी लहि आनंदको पद सो भवसागर पार लगेंगे ॥ ८ ॥ ३२ ॥

घनाक्षरः—

अजर अखंडरूपि, परम प्रकाशी देखो, सूर्यसे उजासी लेखो अतिहि सोहायो है ॥ ब्रह्म जग भर्म मिटि, झाईं संधि काल नाशी, संशय सब चूर करी, धूरसी उड़ायो है ॥ वेदहु प्रमाण और बानीनके मत जेते, औरहु सिद्धांत सोतो, सर्व ले देखायो है ॥ सबहु जाने सोतो, सर्वहुसे न्यारो रहे सोईं गुरुरूप निज, पारख लखायो है ॥ ३३ ॥

दोहा-बारों तन मन धन सबै, पद परखावनहार ।

युग अनंत जो पचि मरे, बिन गुरु नहि निरुत्तार ॥ ३४ ॥

श्लोक—ध्यातं सतगुरुभेतरूपममलं श्वेतांबरं शोभितं ॥ कौणैः कुण्डल भेत्तगुप्तमुकुटं हीरामणिर्मंडितं ॥ नाना माल मुक्तादि शोभित गला पद्मासने संस्थितं ॥ दयाब्धि धीर सुप्रसन्न वदनं सतगुरु तन्त्रमाप्ति ॥ ३५ ॥ द्वै पदं द्वै भुजं प्रसन्न वदनं द्वै नेत्रं दयालं ॥ सेली कंठमाल ऊर्ध्व तिलकं श्वेतांबरी मेखला ॥ चक्रांकित शिर टोप रत्न खचितं द्वै पंच तारा धरे ॥ वंदे सतगुरु योगदण्ड सहितं कवीरं करुणामयम् ॥ ३६ ॥

दोहा-बंदनीये गुरु परखको, बारबार कर जोर ।

दयाकरण संशय हरण, संतरूप प्रभु तोर ॥ ३७ ॥

बंदीछोर कृपालु प्रभु, विघ्न विनाशक नाम ।

बंदे सन्मुख पारखी, शीस भेंट धरु हाथ ॥ ३८ ॥

अशरण शरण बंदों चरण, सब विधि मंगल धाम ।

बचन उचारो बंदगी, सत्य प्रेमके साथ ॥ ३९ ॥

(सब सेवक तथा साधु मिलके महंतोंकी बंदगी करनेके पश्चात् सब मिलके महंतोंकी आरती करना)

आरती शब्द ॥ आरती हो गुरु आरती हो ॥ आरती गरीब निवाज, साहेब आरती हो ॥ टेक ॥ ज्ञान आधार विवेककी बाती,