भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(७६)

कबीरपंथी—

सुरती ज्योति जहँ जाग ॥१॥ आरती कहूँ सतगुरु साहेबकी, जहाँ सब सन्त समाज ॥२॥ अरस परस बहु आनंद भयो, टूटि गये सब यमके जाल ॥३॥ साहेब कबीर संतन कृपासे भयो परखपरकाश ॥४॥

उपरान्त सब शब्द तथा सेवक खड़े होकर सत्गुरुकी प्रार्थना स्तुति करना। बोहा—

दास जानि निज आपना, विनती सुनिये मोर । विनवतहौं कर जोरिके, गुरु शरणागत तोर ॥१॥ काम क्रोध मद लोभमें, निज मैं रहौं भुलाय । दीन दास प्रभु जानिके, लीजे बन्दि छुड़ाय ॥२॥ मम दृष्टि महा मलिन है, खानि बानिके बीच । दया करी गुरु बोधिये, मोहि अधम अति नीच ॥३॥ काल जाल बहु फेरमें, परचो मैं निपट गँवार । शरण आयकी लाज है, माहिब लेहु उबार ॥४॥ मन बच कर्म सु साधुसे, टूटे ना मम नेह । बन्दीछोर यह दीजिये, वरदान सदा अच्छेह ॥५॥ साहेबके दारबारमें, कमी काहुकी नाहिं । बन्दा मौज पावे नहीं, चूक चाकरी माँहि ॥६॥

गुरु स्तुति । छन्द ।

गुरु दुखित तुम विनु रटहु द्वारा, प्रगट दरशन दीजिये ॥ गुरु स्वामी या सुनु विनती मोरी, बलि जाउं बिलम्ब न कीजिये ॥ गुरु नैन भरी रहत हेरों, निमिष नेह न छांड़िये ॥ गुरु बांह दीजे बन्दिछोरसो, अबकी बंद छुड़ाइये ॥ विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, बिन देखे अब ना रहौं ॥ तपत तनमें उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहौं ॥ गुण अवगुण अपराध छिमा करि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास जनकी, सत्य पुरुष अब मानिये ॥ ७ ॥

श्लोक—न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ॥

गुरुज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरुहे नमः ॥ ८ ॥

इति बृहदानुपरी संज्ञानुमिरन ।

इति श्री कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य भारत पथिक स्वामी श्रीयोगलानन्द विहारी निमित्त कबीरपंथी शब्दावली अन्तर्गत संज्ञानुमिरन समाप्त सूक्तम् ॥