कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
मरे ना कबहुँ, सो मूरत मनमानी। लखत बने तो भल सुख उपजे, ज्ञानरतनकी खानी ॥ जाका आहि सकल जग रचना, इछाते भइ अनहद बानी। कहे कवीर सुनो भाई साधू, उलट दिष्ट जाकी सुरत समानी ॥
शब्द ८४—अजब रंग लागारे गुलजार ॥ टे० ॥ चलो सखी जहां देखन चलिये, निरत करे करतार। मिली सोहागिन परम पुरुषको, जुगन जुगनके यार ॥ झिलमिल जोत निरंतर दरसे, विच विच मोतिनके हार। कहे कवीर सुनो भाइ साधू, सतगुरु कवीर अपार ॥
शब्द ८५—निरख निज नामहिं चीन्हो हो ॥ टे० ॥ नाम बिना बहुते दुखी वे तीनों देवाहो। गन गंधर्व मुनि देवता, सब कालके भेवा हो ॥ पानी तज पय अचवे, सो हंसा कहिये हो। सो हंसा ना विछुरे, जिन या मति लहिये हो ॥ भेष धरे पाखंडका, करता नहिं चीन्हा हो। मिथ्या जनम गवाईया, जम कागद भीना हो ॥ काम क्रोध मद त्यागके, निरमल कर लीन्हा हो। कहे कवीर सुख अमर दे, दुख बनिज न कीन्हा हो ॥
शब्द ८६—संतो तो उतरे भौ पारा। मनकी ईद्री सबही त्यागे, छांडे विषै विकारा ॥ टे० ॥ धीर गंभीर औ सहज भावसों, गहे सतनाम पियारा। प्रेमभाव उपजे हिरदेमें, साध संगत आधारा ॥ दया धीर संतोष धरे जिव, सुरति निरति चित धारा ॥ ज्ञानदृष्टि सबहीको देखे, गहे शब्द टकसारा। सत सुकितके नावपैँ चढ़िये, ज्ञानगुरु कडिहारा ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, उतरो भौजल पारा ॥
शब्द ८७—संतो अब मेरा मन माना। सतगुरु राह बताय दई है, चीन्हो आतमरामा ॥ जो उपदेश दियो मोहि सतगुरु,