कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ताहि कियो पहिचाना । घाट वाट कोई रोकि सके नहिं, हाथ दियो परवाना ॥ सो हंसा निज घरको पहुँचे, दीन्हा ज्ञान दामा ॥ डंका बाजे शब्द विराजे, शिरपर छाजे नामा । श्वेत ध्वजा फहरात धनीकी. निरभै अनहद धामा ॥ कहैं कवीर बलिहारी गुरुकी, दर्द अविचल विसरामा ॥
शब्द ८८-संतो नायक राम हमारा । जाका सब जग है बन-जारा ॥ टे० ॥ पाप पुन्य दोउ बैल लदाये, तूष्णा गोन भराई । पांच जने मिल लादन लागे, गोनी लाद न जाई ॥ आज्ञा थाकी मनसा थाकी, थाकी कंचन काया । सुरति निरति वह दोनों थाकी, एक न थाकी माया ॥ या संसार हाटका लेखा, सब कोई बनिजे आई । कहैं कवीर जिन जैसी लादी, तिन तस करी कमाई ॥
शब्द ८९-गुरु मोही छुँटिया पिलाई ॥ टे० ॥ जबसे गुरु मोही छुँटिया पिलाई । भई सुचित मिठी दुचिताई ॥ ज्ञान ओषधी रतन कटोरी । सो भर पिवत कुमति गई मोरी ॥ ब्रह्मा पिये विष्णु लौलाई । शिवशंकर रहे ध्यान लगाई ॥ कहैं कवीर सुनु साथो भाई, गुरुके चानपर ध्यान लगाई ॥
शब्द ९०-बेग गहो गुरु सरना हो, भटक मर जाइ ॥ टे० ॥ या संसार कागदका पुत्रा, बूंद परे गल जाना हो ॥ या संसार अगिनकी चिनगी, भूल परे जल जाना हो ॥ या संसार काँटेकी बारी, समुझ समुझ पग धरना हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरख परख गुरु करना हो ॥
शब्द ९१-भलारे गुनी ऐसो गजब न कीजे ॥ टे० ॥ गरब किये रतनागर सागर, जल खारा कर डारा रे गुनी ॥ गरब किये लंका-पति रावन, मरद गरद कर डारा रे गुनी ॥ गर्ब किये जंगलके घुंगची,