कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सुँह कारा कर डारा रे गुनी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, गर्ब किया सो हारा रे गुनी ॥
शब्द ९२-प्रेम बान जोगी मारा हो, कसके जोर मोर ॥ टे० ॥ जोगियाकी लाली लाली अंखियां हो, जैसे कँवलके फूल ॥ हमरो सुरंग चुनरिया हो, सोहै तालमतूल ॥ जोगीको लेवे मृगछाला हो, हमरो पट चीर ॥ दोऊ मिल सीवे गुदरिया हो, होइजाय फकीर ॥ गगनमें बंसी बजावे हो, चितवे चहुँ ओर ॥ जोगी अजब रंग भीना हो, मन हर लीन्हा मोर ॥ जोगिया अमर मरे नहीं, पुरवे मेरी आश ॥ पुरब जनम फल पायेऊँ हो, गावे धनी धर्मदास ॥
शब्द ९३-जिव जिन मार सुवा मत लावो, मांस बिना मत आवो हो ॥ टे० ॥ पैल पार एक बेल वृछवा, वृछामें पत्र नहीं है हो ॥ सोई पत्र चुग जात मिरगवा, मिरगाके शीश नहीं है हो ॥ उरबिन खुरबिन चरन चोंच बिन, पंख बिहूना हँसा हो ॥ सो सावज मोहि मार देखावो, जाके रकत न मेसा हो ॥ धनुष बान ले चलो पारधी, धनुषमें पनच नहीं है हो ॥ सोई धनुषसे मारे मिरगवा, मिरगाके घाव नहीं है हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरबाना हो ॥ जो या पदके अरथ लगावे, सोई संत सुजाना हो ॥
शब्द ९४-झडाका सुमरनसे मन लागा ॥ टे० ॥ मथुरा आम बोवाइया, जगन्नाथ गई डार । फूल फुलाने द्वारका, फल लागे बद्दीद्वार ॥ पोस्ताकेरे खेतमें फूल बना सब हेत । कोई कुदरती लाल है, और सेतका सेत ॥ आगे दिन पीछे गये, किये न हरिसे हेत । अब पछताये का भया, जब चिरिया चुन गई खेत ॥ आग झरे लोहा झरे, झर झर परे जंजीर । गुरु रामानंदके फौजमें, सनमुख लडे कवीर ॥
शब्द ९५-साहेब बाग लगाया है कोई अजब तरेका ॥ टे० ॥