कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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चार खूंट चौरासी क्यारी, ता विच फूल फुलाया है । मोहके क्यारा बागके भीतर, बारमबार सिंचाया है ॥ सूख गये कँवल भँवर जब उड़ चले, लालचसे फिर आया है । कहें कवीर सुनो भाई साधू, साहेबका फुरमाया है ॥
शब्द ९६—कोई दिन याद करोगे, रमता राम फकीर ॥ टे० ॥ कोइ दिन सोवे कोइ दिन जागे, कोइ दिन साईंकी जगीर ॥ कोइ दिन ओढे साल दुशाला, कोइ दिन भगवाँ चीर ॥ कोइ दिन पावे मेवा मिठाई, कोइ दिन अचवे नीर ॥ कोइ दिन बैठे घोडे पालकी, शिरपर अबदागीर ॥ कोइ दिन जंगल कोइ दिन बसती, फिरते लाल फकीर ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, गुरुके चरन रहु थीर ॥
शब्द ९७—चरखा तोर डारो हो, भजो रामके राजी ॥ टे० ॥ चरखा तेरा रंग बिरंगी, पोनी लाल गुलाल । कातनवारी छेल-छवीली, तन मन डारे तार ॥ छोटकी ननदिया चीकन पीसेछे, वडकी भरेछे पानी ॥ वो दहिजरवा लीटी लगाइस, हम चरखा तर रहली ॥ जाये गवाँये गँवार परोसिन, हम चरखेकी रानी ॥ एक वेर चरखा कातन पाऊं, दोहरी नथनी गढानी ॥ सात सेरकी सात बनाये, चौदा सेरकी एकै ॥ वो दहिजरवा सातो खायस, हम कुलवती एकै ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरबानी ॥ जो या पदके अर्थ लगावै, ताको सुकति निशानी ॥
शब्द ९८—अवधू मनमथ करुम न होता । तब धर अघर कहाँते होता ॥ टे० ॥ मात पिता मिल बेरा साजे, करी कर्मकी पूजा । पहिले पिता अकेले होते, पूत भये भय दूजा ॥ अलख रूप आतुर होय खेला, नादहिते बिंद छूटा । ताका सकल पसारा कहिये, कवीरपंथी शब्दावली २६