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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 816

(८०२)

कवीरपंथी-

ब्रह्म किंच होय फूटा ॥ याको निदे वाकों बंदे, सो तो निगुरा कहिये । याते न्यारा वाते न्यारा, न्यारा न्यारा रहिये ॥ कहैं कवीर सोई सुख कीन्हा, आप आपमें मेला । रचि जनि रहो बिरचि जनि छांड़ो, संग मिल रहो अकेला ॥

शब्द ९९-अवधू निरख परख गुरु करना । तन मन कछू हाथ ना आवैं, काहेको पच मरना ॥ टे० ॥ काल न छूटो जंजाल न मेटो, भयो न मनको सूरा । कुलको बास करो मत कोई, जो गुरु मिलै न पूरा ॥ अष्टधातका पिंजरा बनाया, तामैं जुगतका सूवा । सतगुरु मिलै तो कालसे बांचे, ना तो परलै हूवा ॥ कंदप रूप कायको मंडन, मिथ्या काह उलीचै । कहैं कवीर समुझ नर भोंदू, अमी अरंड का सींचे ॥

शब्द १००-अवधू जोग अपूठो पैडो । पहुँचेगा कोई गुरुका बालक, निगुरा भूला गैडो ॥ टे० ॥ पोढ़ी झटक बाज गहिलीने, छेरीने सिंह खाया । चीतेकी गरदन हरन दबाई, खलक तमासे आया ॥ खोजेके घर बालक उपजे, गगनमें सिंगी पूरी । ले मरघट सुरदा पर जारे, तस कर ऊपर सूरी ॥ कहैं कवीर सुनो हो अवधू, अकथ कथा यह भाखी । जानेगा कोई जाननहारा, नार पुरुष पर राखी ॥

शब्द १०१-अवधू सो जोगी पद बूझे, जाको अगम अगोचर सूझे ॥ टे० ॥ काया हमारी शब्द बोलिये, ज्ञान भभूत प्रकाशा । सुरत हमारी सवता कहिये, अलख हमारो बासा ॥ सिंगी शब्द अनाहद बाजे, उनमुन शब्द समाना । प्रेम पियाला पीवे जोगी, धुनमें अघर अमाना ॥ मीच बिन मरन नीर बिन तरना, राग बिन रंग अपारा । सोवे सदा जागे निशिवासर, ऐसा शब्द बिचारा ॥