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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८०३)

कहें कवीर सुनो हो अवधू, सबद कहां तुम पाया । सत्य शब्द सतगुरुको चीन्हो, माया जग भरमाया ॥

शब्द १०२—कैसे बोलो स्वामी, गगन नहीं धरनी । चंद न सूर दिवस नहीं रजनी ॥ टे० ॥ जड़ नहीं मूल वृच्छ नहीं बेल। सबद न स्वाद गुरु ना चेल। उपजे न विनसे आवे न जाई । जरा मरन वाके बाप न माई ॥ नहायवेको न तीरथ न परसवेको देवा । कहें गोरख सुन अलख अभेवा ॥

शब्द १०३—ऐसे बोलो अवधू गगनमें धरनी । चंदमें सूर दिवसमें रजनी ॥ जरमें मूल वृच्छमें बेल। शब्दमें स्वाद गुरुमें चेल। उपजेमें विनसे आवेमें जाई । जरा मरन वाके बापहिमें माई ॥ नहायवेको तीरथ परसवेको देवा । कहें कवीर सुनो गोरख भेवा ॥

शब्द १०४—रामुरा ऐसा को बैरागी । आठ पहर लग रहे सबदसो, कलह करूप विष त्यागी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा एक सृष्टिका करता, नाम कुलाल धराया । बहु विध भांडे उन्ही गठिया, मायाको अंत न पाया ॥ तरवर एक नानाबिधि फरिया, जाके पत्र न साखा । भौजल भूल रहे सब प्रानी, सो फल किनहु न चाखा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, मिथ्या दुनियां अंधी । माटीमें माटी मिलजासी, सबद गुरुका संधी ॥

शब्द १०५—ऐसे राम कहे का होई, जोपै मनकी दुविधा न खोई ॥ टे० ॥ राम कहि कहि नरक परत हैं, पठ पठ वेद पुराना ॥ राम कहि कहि सबे गये हैं, मिटे न अवाजा ॥ राम कहि कहि सती जरत हैं, साधनमें न समाई ॥ डाक परी लिये हाथ सिधोरा, मृतकसे लौ लाई ॥ वेद पठे पर भेद न जाने, पठ पठ लोक रिझावे ॥ कालपुरुषका मरम न जाने, घर जरे धूर बुझावे ॥