कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पहिचानी ॥ कहें कवीर गुरु ब्रह्म चीन्हो, जात जनेऊ सोई । पारखंडकी गत सबे मिटावे, तब निज ब्राह्मन होई ॥
शब्द १०९-पंडित पढ पुरान का कीन्हा । साथ संतकी सेवा कीन्ही, भूखेको अन्न न दीन्हा ॥ टे० ॥ पूज सिला चंदन घस लावे, बक ज्यों ध्यान लगावे । अंतरगतके राम न चीन्हे, थोथे घंट बजावे ॥ काम न बिसरो कोष न छूटो, लोभ न बिसरो देवा । परनिंदा ते ह्दै न बिसरी, निरफल गइ तेरी सेवा ॥ दोष लगाय घर मूस पराया, पेट भेर अपराधी । जो निंदा तोहे साधन बरजी, सो हिरदे आराधी ॥ कहें कवीर संतनकी महिमा, परम पुनीत मुनाई । आपा मेट आपको चीन्हो, तबे परमपद पाई ॥
शब्द ११०-पंडित होय तापहि भारी । जाके चित्र गुप्त लिख धारी ॥ टे० ॥ जीवत जीव ब्रह्मको डुरखे, खून करा घर माहीं । तृष्णा कारन जीव बधत हो, बूड रसातल जाही ॥ चौका दे शुचि संजम कीन्हा, सुनो महात्म लोई । जो मर सुनके अन्न तजत है, सो मर तपे रसोई ॥ कर अह्मन तिलक कर बैठे, कांघे त्रिगुन जनेऊ । हँडिया हाड हाड थारी मुख, अब षट्कर्म बनेऊ ॥ घाटी उतर भई सब माटी, मन धीरज धर रहिये । कहें कवीर ये विषके लाडू, खाय पीर कोन सहिये ॥
शब्द १११-मियांजी देखा अजब तमाशा । सांची बात कही ना माने, झूठा लगे खुलासा ॥ टे० ॥ कहे हक पर हक न बूझे, नाहक जीव सताया । हाथ पांव बरबसके बांधे, गल बिच छुरी चलाया ॥ खासे दोस्त नबी साहबके, जिव बध नहिं फरमाया । एक मिस्वाक मास शश्य करते, वृक्षों नाहिं सताया ॥ भूखेको वे भोजन देते, प्यासेको पानि पिलाया । उमर तमाम बंदगी कीन्ही, जो सिवाय नहिं खाया ॥ फक्का फकर फकीरी खुसकी,