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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 820

(८०६)

कबीरपंथी-

खसे कछू न चाहा । शब्द कवीर खोज दिल अंदर, तब पावे कुछ लाहा ॥

शब्द ११२-मियांजी बोले नाम न आवे । दूधको दूध पानीको पानी, जोरे करे सो पावे ॥ टे० ॥ हो मिसकीन खुदाई बंदा, तू जियरा जस भावे । असल खोदाय दीनको साहब, जोर नहीं फरमावे ॥ रोजा रहै निमाज गुजारे, कलमा भिस्त न होई । सतर कावे हैं घट भीतर, जो लख पावे कोई ॥ धनीकी जासकी आस कर बंदे, मान मनी कर दूरी । आपा मेट औरको खोजो, तब पावो कछु मूरी ॥ माटी एक बने बहु भांडे, सबमें नूर समाना । कहैं कवीर ऐसी भिस्त छोडके, दोजक सों लपटाना ॥

शब्द ११३-मुलना खूब नजर दिल दीजै । हाजिर नाजिर है घट भीतर, जबह काहेको कीजै ॥ टे० ॥ पकर हलाल हाथ कर लीन्हा, पाँचों पीर मनाया । हलाल हता तो खोय गया अब, मुरेदे सीख लगाया ॥ पैगम्बर महि रकतसों राजी, आपहि सजल सँवारा । फेर दरेग कयामत ताई, दामनगीर तुम्हारा ॥ कर निमाज सिर भुईमें मारे, मैं बंदा खोदाई । कर खून तूजनाके कारन, साहबका फुरमाई ॥ का तसबी दानेके फेरे, पढ पुरान का बूझा । दिलके नैनन अंध भये हैं, परम तत्त्व नहीं सूझा ॥ जो जेहि मारे सो तेहि काटे, मिटे न भौजल फेरा । कहैं कवीर तुम जोर करत हो, कहा न मानो मेरा ॥

शब्द ११४-देखो बनी आदमकी बातें । सांची बात कही न माने, नरक परत हैं ताते ॥ टे० ॥ ओछी बुद्धी त्वचा चामकी, ओ थोरे धन माते । थोरी उमर गुमर बहु भारी, अड्या काम कलाते ॥ हरचा ज्ञान ध्यान मम भूला, दृष्टि लगी अबलाते । वे तो आठे दसमी जागे, बेक़रे बार वफाते ॥ अंगुरी नाय कान