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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८०७)

दोउ मूँदे, पढे बंग सलवाते । रोजा करे निमाज गुजारे, सत्रह पढे रकाते ॥ साझ परे खानेकी बेरा; उमड करे जिव घाते । करे खून बंदगी ठाने, पाक कहें कलमाते ॥ भूले दीन दया तज भागे, दृष्टि लगी विषयाते । भीतर भरी भंगार भरमकी, ऊपर माजे गाते ॥ जानत नहीं आप अपनेको, आय गये धों कहाँते । दरद न जाने पीर पराई, चलत फिरत इतराते ॥ कहें कवीर यह अजब तमाशा, इनको भिस्त कहाते ॥

शब्द ११५—सेखजी बंदा सुरीद केहे केरा । इस पदका करौ निबेरा ॥ कबकी बात कही पैगम्बर, हती कौनसी बेरा ॥ क्या महम्मद तुम्हे गुप्त सुनाई, किताबें नौ हजार ॥ का तुम राखी का तुम प्रगटी, हजूर कहिके परदा ॥ खोजा खोज करो तुम अजहूँ, वह औरत है की मरदा ॥ कौन बिलायत कौनसी जगह, बैठे थे किस ठाई ॥ औवल सफा हकीकत बोलो, तुम जानत हो की नहीं ॥ का फरमान हुवा बंदे पर, की तुम कहो बनाई ॥ कहें कवीर साहब फरमाई, के बीचहि कल्पाई ॥

शब्द ११६—काहूने फिर न कही वह बातें । जो नर यहाँ ते सुकृत कर गये, ता फलकी कुसलाते ॥ सूर चले सनमुख रन जीतन, दे सनमुख उर घाते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सहत सेल सिर सांटे ॥ सती जरे पिया अपने संग, बिरह प्रेम रस माते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सीरे जरी कि ताते ॥ यह संसा उठे उदमुख जो, आय गये धों कहाँते । कहें कवीर देहगत ऐसी, जान परी है याते ॥

शब्द ११७—नर तू पार उतर कहाँ जेहो ॥ आगे पंथ पंथी ना कोई, कूच मुकाम न पैहो ॥ टे० ॥ नीर नाह नहीं खेवट किरवा, ना गुन खेवनहारा । धरती अकाश करूप कछु नहीं, ना कछु वार न पारा ॥ यह तो आपी आपा कहिये, सुन्न सोध ना पैहो ।