कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(८०७)
दोउ मूँदे, पढे बंग सलवाते । रोजा करे निमाज गुजारे, सत्रह पढे रकाते ॥ साझ परे खानेकी बेरा; उमड करे जिव घाते । करे खून बंदगी ठाने, पाक कहें कलमाते ॥ भूले दीन दया तज भागे, दृष्टि लगी विषयाते । भीतर भरी भंगार भरमकी, ऊपर माजे गाते ॥ जानत नहीं आप अपनेको, आय गये धों कहाँते । दरद न जाने पीर पराई, चलत फिरत इतराते ॥ कहें कवीर यह अजब तमाशा, इनको भिस्त कहाते ॥
शब्द ११५—सेखजी बंदा सुरीद केहे केरा । इस पदका करौ निबेरा ॥ कबकी बात कही पैगम्बर, हती कौनसी बेरा ॥ क्या महम्मद तुम्हे गुप्त सुनाई, किताबें नौ हजार ॥ का तुम राखी का तुम प्रगटी, हजूर कहिके परदा ॥ खोजा खोज करो तुम अजहूँ, वह औरत है की मरदा ॥ कौन बिलायत कौनसी जगह, बैठे थे किस ठाई ॥ औवल सफा हकीकत बोलो, तुम जानत हो की नहीं ॥ का फरमान हुवा बंदे पर, की तुम कहो बनाई ॥ कहें कवीर साहब फरमाई, के बीचहि कल्पाई ॥
शब्द ११६—काहूने फिर न कही वह बातें । जो नर यहाँ ते सुकृत कर गये, ता फलकी कुसलाते ॥ सूर चले सनमुख रन जीतन, दे सनमुख उर घाते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सहत सेल सिर सांटे ॥ सती जरे पिया अपने संग, बिरह प्रेम रस माते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सीरे जरी कि ताते ॥ यह संसा उठे उदमुख जो, आय गये धों कहाँते । कहें कवीर देहगत ऐसी, जान परी है याते ॥
शब्द ११७—नर तू पार उतर कहाँ जेहो ॥ आगे पंथ पंथी ना कोई, कूच मुकाम न पैहो ॥ टे० ॥ नीर नाह नहीं खेवट किरवा, ना गुन खेवनहारा । धरती अकाश करूप कछु नहीं, ना कछु वार न पारा ॥ यह तो आपी आपा कहिये, सुन्न सोध ना पैहो ।
(८०८)
कवीरपंथी—
विलैमान हो जाहु छिनकमें, याहू ठौर बिन होइ हो ॥ बारंबार विचार सोच जिय, अपने माहिं समैहो। कहैं कवीर मुक्ति नहि आगे, ज्योंका त्यों ठहरैहो ॥
शब्द ११८—नर तुम कियों न एकौ काजा। काम कोध तृष्णाके बांधे, लूटत है जमराजा ॥ ८० ॥ बनखंड जाय जोग तप कीन्हा, कंदमूल फल खाया। होते ज्ञानी परम सुख ध्यानी, पाती काह लिखाया ॥ चार वेद तुम हित के राखे, फीकी उनकी आशा। काल भच्छ सब दुनियां सिरानी, इन्हीके विस्वासा ॥ प्रेम भगति हिरदे ना आवे, नाच काछ मन दीन्हा। राग रागिनी डिंभ धरीधर, तिन हरसों का लीन्हा ॥ फिरै काल अनंत लोकमें, मध्य लखे मुनि ज्ञानी। कहैं कवीर ते भये खालसे, रामभक्ति दिद जानी ॥
शब्द ११९—नर तुम झूठे जनम गवाईया। उस झूठेका कोई अंत न पाया ॥ ८० ॥ झूठेके घर झूठा आया, झूठे ते परचाया। झूठी थारी झूठा भोजन, झूठे ले सब खाया ॥ झूठेके घर झूठा आया झूठे व्याह रचाया। झूठा दूलह झूठी दुलहिन, झूठे व्याहन आया ॥ झूठे नर सब झूठी नारी, झूठे बालक जाया। झूठी छाती झूठी कोखी, झूठी दूध पियाया ॥ सांच कहुँ मैं झूठ न बोल्हूँ, सांचेको झूठाया। कहैं कवीर सोई जन साँचा, अपने माहिं समाया ॥
शब्द १२०—सुन राजा हरचंद भुवनके, सत्त तुम ठानी। विप्र एक काल होय प्रगटो, तुमहुँ असत्त न छानी ॥ ८० ॥ पतनी सहित राज तुम दीन्हा, हाटो हाट बिकानी। जो यह सत्त भली पुन होती, करत नहीं कुल हानी ॥ जेहि कारन तुम नीच डोम घर, भरलाये घट पानी। बसहीके तुम चीर छोडाये, उलटी मत तुम ठानी ॥ अगम अगोचर मूल ब्रह्मको, सो तुम कितहु न पाई। सत्यकर तुम नीच बुध घर, फिर फिर जोनी आई ॥ भरम छांड
शब्दावली
(८०९)
सत्य तुम चीन्हों, सत धोख न कहाई। सत्सरूप जबे तुम पावो, यह सत चित्त न आई॥ मैं तो तुमरे भले कहत हों, सत्य सरूप विचारो। कहें कवीर वह सत् समुझके, आवागवन निवारो ॥
शब्द १२१-देखो अलख पुरुषकी करनी, बड़े बड़े धरा बिगूचे ॥ टे० ॥ हरचंद चले मिहरी बेचनको, पूतहि खायो सांपा ॥ वाकी अम्मा जरावन लागी, जरन न देतो बापा ॥ दशरथके दोय पुगरा कहिये, औरत सो चित दीन्हा ॥ बडा वियोग भया रघुपतिको, रावन गा सिर छीना ॥ सोरा सहस आठ पटरानी, एते कान्हर आनी ॥ बड़े उजीर हते पाठनमें, तिनहूँकी दुरम लुटानी ॥ पांचो पांडव छठी द्रौपदी, और बिगूचे केता ॥ लैके हाड हिमारे गारे, जन कवीर जग जीता ॥
शब्द १२२-धर्म सुत काहे न देख बिचारी। सत् बोलते राज तुम्हारे दीन्हों देश निकारी ॥ टे० ॥ पांच पूत कुंतीके कहिये, एकोतरसौ गंधारी। एकै बुंद पिताके होते, काहेको मांडी रारी ॥ ब्रह्मज्ञान अरजुन तब चीन्हें, धनुष बान दिये डारी। छल प्रपंच कृष्ण एक कीन्है, दीन्हा बदन पसारी ॥ पांच भइयाकी एकै नारी, सबही संग सुख कीन्हा। जीवदान भीम तब मांगे, कृष्ण सहित आधीना ॥ भारथ भरीके अंडा राखे, तुम कुरुक्षेत्र कराये। गोत्रघाव दाव नहीं जानो, ताते हिमाल पठाये ॥ कुंजल एक हतो रन भीतर, तुमसो झूठ बोलावे। नरकबास दिखलावे तोही, जब सुरपुरहि पठावे ॥ सोई सत् दो परदी कहिये, जाकी भक्ति तुम ठानी। कहें कवीर सुनो हो पांडव, हिरदै करो बिलछानी ॥
शब्द १२३-संतो परी अरुझन भारी। कहे सुने कछु हाथ न आवे, अविगतकी गत न्यारी ॥ टे० ॥ कोई कहे हम निरगुन सेवै, निरगुनका गुन कैसा। को निरगुन को सरगुन कहिये, एही
(८१०)
कवीरपंथी—
बडा अंदेशा ॥ निरगुन कहिये नाम महातम, सरगुन संत विराजे । गुन बिन निरगुन हाथ न आवे, औगुन देखे भाजे ॥ निरगुन सरगुन एक रूप है, बिरला जन पद परसे । हंस शब्द एक चित होवे, अमी सुधारस बरसे ॥ कहैं कवीर अंतरकी करनी, परगट होय तब सांची । अपने पति केर पतिबरता, गगन मगन होय नाची ॥
शब्द १२४—सो तो अबिगत अगम अपार, पार कस पावै ॥ टे० ॥ जा खोजत ब्रह्मादि भुलाने, तिनहुँ न पाये भेव । जा खोजत शिव मगन भये, शनकादिक शुकदेव ॥ सतखुगमें सतबरता, द्वापर पूजा पान । त्रेता होम जह्र व्रतसंजम, कलखुग केवल नाम ॥ सेस सहसमुखुख निस दिन गावे, अस्तुत करे सुरार । ऋग् यजु साम अथर्वन थाके, कर न सके निरवार ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, दिगंबर दरवेस । चुंडित मुंडित और जटाघर, ये उरझे बहु भेश ॥ तीरथ गये ते एही महातम, तब कोई पूजे पानी । एको सुमत हाथ नहिं आवै, कर गय मुनिजन ज्ञानी ॥ धरती अगिन पवन औ पानी, भिन्न भिन्न विस्तारा । आवे न जाय मरे न जीवे, सबते रहत निनारा ॥ जो कहिये सबहीमें साहब, मौत कहांते होई । कहैं कवीर तिनके जिव डोलै, पिंड प्रान बिन सोई ॥
शब्द १२५—हैरे अडोला कहिं डोलत नाही ॥ गगनमें चंदा जलबिच झाई, मीन गहे मुख आवत नाही ॥ टे० ॥ चंदन काठ सुख जो जाही । ताकी बास ताहीमें रहाही ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी । तन नहिं खोजत खोजत मूरी ॥ कहैं कवीर मन मिलिया होई । शब्द सुरतमें राख समोई ॥
शब्द १२६—कोई जन जानेगाहो अबिगत नाथ मतो ॥ भंजन घडन सँवारन आपे, अलखपुरुष रहतो ॥ टे० ॥ ईददवन ऐसेहोते, नित घृते होम करतो ॥ अजगर कीन्हे कूपजलको, पवन भखी
शब्दावली
(८११)
भस्व रहतो ॥ राजा नल ऐसे होते, नित सहस गळ देतो ॥ कज- रीबनके कुंजर कीन्हे, हरी डार चरतो ॥ राजा हरिचंद सतवादी, नित सत्यहिसे रहतो ॥ ढोये नीर नीच घरहीको, भये मरघटके मँगतो ॥ दस मस्तक बीस भुज वर रावन, रात दिवस बकतो ॥ छिन्मै मार पछारिया, गये लंकासे रीतो ॥ राजा बलि ऐसे होते, नित सहस जह्न करतो ॥ ताहि पताल पठाइया, जहां शेशनाग रहतो ॥ अजामेल ऐसे होते, नित गनका संग करतो ॥ ताहि बैकुंठ पठाईया, ऐसी उलटी रीत करतो ॥ पांडवसुत ऐसे होते, नित छपन भोग करतो ॥ ताहि मार पठाइया, ऐसे प्रीत तोर बिचरतो ॥ जिन खोजा तिन पाईया, कोई साधूजन लहतो ॥ संतन सदा समीप बसत है, गावै जन कवीर भगतो ॥
शब्द १२७-संतो कोई जन शब्द बिचारा ॥ शब्द भेद आद सतगुरुका, परखलेव टकसारा ॥ १० ॥ शब्दै सुन सुन भेष धरत है, शब्द कहे अनुरागी ॥ षट्दर्शन सब शब्द कहत है, शब्दै कहै बैरागी ॥ शब्दै वेद पुरान कहत है, शब्दै शब्द ठहरावे ॥ शब्दै सुनिवर साथ कहत है, भेद न कोई पावे ॥ शब्दै येही जग उपजाया, शब्दै केर पसारा ॥ कहैं कवीर जहांते शब्द उपजो, ताका भेद नियारा ॥
शब्द १२८-संतो जिन जाना तिन माना ॥ शब्दहि चाल चले कोई बिरला, कथनी कथ लपटाना ॥ १० ॥ शब्द निराधार जीव आधारी, कहु कैसे रहि जाई । बीचहि अटक रहै बैपारी, भेंट सबनकी खाई ॥ रहे सरगुनमें कहैं निरगुनकी, दुनियाभाव न जाई । निरगुन सरगुन दोउ पछ भारी, फिर माया लपटाई ॥ ईद्री भोग आपनी जाने, दोजकसों मन माना । कहैं कवीर जिभ्याके लंपट, माया हाथ बिकाना ॥
(८१२)
कवीरपंथी—
शब्द १२९—कहे सुने कछु नहीं संतो, कहे सुने कछु नहीं ॥ जब लग जीव जंजाल न छूटै, विषै विकल तन माहीं ॥ टे० ॥ करत अनीत मगन मायामें, कहें अगमकी बानी । सो प्रतीत जो साध न मानी, मुष्ट माहली जानी ॥ सीखे साख ब्रह्म होय बैठे, निरभै बिषै कमावे । पूछते परपंची गानी, साख अगमकी लावे ॥ षद् सारखी सिध साधिक दीसे, ईन्द्रिन हैं अपराधी । जो घट नाम नहीं निज निर्मल, देह दशा को साधी ॥ जो कछु किये ज्ञान अज्ञाना, सोई समझ सयाना । कहें कवीर तिनसो का कहिये, देखत दृष्टि भुलाना ॥
शब्द १३०—संतो कथनी कहे ते खोटा ॥ जो लग कर्म बिकार न खोवै, कोयला कपट जिय औटा ॥ टे० ॥ ज्ञान ग्रंथ कब चातुर कीन्ही, बांधे विषके मोटा । तज अनरीती औ कुलके लालच, जगमें बडे घर लूटा ॥ सांचे शब्दकी चाल न आवै, हिरदै नहीं है हेता ॥ ऐसी भक्ति सुक्ति ना पावो, साहब है नहिं काचा ॥ कहें कवीर अंतरकी करनी, निकसे जिभ्या मुख वाटा ॥ सार शब्दकी परख न आवे, झूठा लागे मीठा ॥
शब्द १३१—मनको चीन्होरे नर भाई ॥ आतम मार पखानहि पूजे, बहो सकल जग जाई ॥ टे० ॥ आगे आगे पंडित पाछे सब दुनियां, अचरज कही न जाई ॥ सबे गये मोहि यही अंदेशा, बहुर खबर नहिं पाई ॥ एक दोय होय तो कहि समझाऊं, जगसों कहा न जाई ॥ वैद्य अनेक स्वान जो लागे, पूछ न मिटै टेढाई ॥ सांच कहों तो सब जग खीजै, झूठा कहा न जाई ॥ समझ कवीर रहो घट भीतर, को पच मरे बलाई ॥
शब्द १३२—भरममें भूल रह्यो संसार । बीज बस्तु कैसे के पावे, जाका सकल पसार ॥ टे० ॥ क्रीतम नाम जान बहु थापे, करता
शब्दावली
(८१३)
रहो नियार। एक दिष्टि चितवत नहिं तनमें, को है सिरजनहार॥ वेद पठे पर भेद न जाने, कथनी कथे अपा। आपर न बूझे जगहिं बुझावे, सूझे वार न पार॥ भ्रगानाभि बसे कस्तूरी, ढूँढे घास उजार। कहें कवीर वा घट परगट, है कोई बूझनहार॥
शब्द १३३-जगमें करता काल कहावे॥ निराकार जग बाडा बांधे, बाहर जान न पावे॥ टे०॥ तीन लोक बाडा बिच कीन्हे, ठौर ठौर रखवारा। ऊपर कोऊ जान न पावे, आप करे संधारा॥ साधे बान धनुष धर लीन्हे, दूतन बाहिर पठावे। भागे जीव ठौर ना पावे, फिर फिर मुखमें आवे॥ सुन्नमें वर्षक जात सरूपी, बैठे घंट बजाई। सुनके जीव सबे उठ दौरे, परे कालमुख जाई॥ सोई रैन उजियारी, देख जीव सब धावे। इनको मारत बिलम न लागे, उसे दरद ना आवे॥ कहें कवीर जो सतगुरु चीन्हे, सो यह भेदहिं पावे। बाडा तोर बाहिर ले निकसे, निहचल घरहिं पठावे॥
शब्द १३४-संतन ज्ञान लहर धुन माडी॥ शब्द अतीत अनाहद राचे, या विधि तृष्णा खाडी॥ टे०॥ खाड बुने कोरीमें बैठा, भौ खूंट दे गाडी। ताना वाना परो उनासा, सुत कहें बुन गाडी॥ वनके ससे ससुंदर कीन्हा, मक्षा चढी पहाडी। शुद्ध पिवे ब्राह्मण मतवाले, फल लागे बिन डारी॥ मूसा तपे बिलारी सेवे, स्यार सिंहको खाई। एक अचंभा देखो भाई, जलमें अगिन रहाई॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, अगम ज्ञान पद माहीं। गुरुप्रताप सुईके नाके, हस्ती आवे जाई॥
शब्द १३५-सहज एक ऐसी हूल परी॥ भागे शिव शनकादिक नारद, मोहे अचेत हरी॥ नौ दस भाग भगे तैतीसौं, चौरासी सगरी॥ भेख अभेख करे को लेखा, काहु न जान परी॥ ब्रह्मा
(८१४)
कवीरपंथी-
आदि ईंद्र सब भागे, सुध बुध सत बिसरी ॥ ये सबहीके देखा- देखी, दुनिया भगी बपुरी ॥ धीरज राख रहे ना कोई, छांड भगे नगरी ॥ कहैं कवीर हटको नहीं माने, धौखेकी बिडरी ॥
शब्द १३६-संतो काल रची जग बाजी ॥ वेद पठे पठ पंडित भूले, पठ कुरान भूले काजी ॥ टे० ॥ आप न बूझे जगत बुझावे, शब्द वेद अरथावे । अमृत विषहिं एक कर माने, भेद न कोई पावे ॥ आप कहे जग काल अपरबल, आपहि धारे ध्याना । जिन जिव दियो सोई जिव लेवै, सबका एही ज्ञाना ॥ वेद पठे औ अरथ विचारे, सूझ बूझ न पावे । जरा मरनके आस बंधै सब, फिर फिर जोनी आवे ॥ जोगी तपसी बुनिवर कहिये, संत साध सब धावे । आवत जात जन्म बहु बीते, अस्थिर घर ना पावे ॥ पीर औलिया गোস कुतबिया, फिर फिर यही पुजावे । मेहनत करे सोई फल भुगते, पाक साहब ना पावे ॥ उतपति परले पैठ लगाई, सकल जीव भरमावे । भँवरजाल कियो भौसागर, पार न कोई पावे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु चीन्हैं, सो यहि भेदका पावे । आवागमन दोऊ दुख मेटै, निहचल घरहिं पठावे ॥
शब्द १३७-माया काली नागनि जिन डसिया सब संसार ॥ टे० ॥ इंद्र डसे ब्रह्मा डसे, नारद डसिया व्यास । बात कहत शिवको डसी, जाके छिन एक बैठी पास ॥ कंस डसे सिसपाल डसे, रावन डसिया जाय । दस मस्तक जाके भूमि परे, ताकर लंका दर्ई लुटाय ॥ बड़ बड़ गारुड सब डसे, कोइ न कीलनहार । कच्छ देश गोरख डसे, जाका जोग अपार ॥ चुन चुन मारे चतुर सूरमा, जाकी करे जग आर । तोसे गरीबकी कौन गिने, कहैं कवीर विचार ॥
शब्द १३८-रामगति पार न पावे कोई ॥ चितामन प्रभु निकट
शब्दावली
(८१५)
छोडके, भरम भरम बुध मत खोई ॥ टे० ॥ नेम धर्म व्रत संजम पूजा, बहुत भांत हर सोधे। सत्य सोहाग कैसेके पावे, अच्छर कंथ विरोधे॥ नारी पुरुष रहत एक संगा, निस दिन जात अबोले। तजि अभिमान मिलत नहिं पियको, बन बन दूदत डोले॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, बूझे बिरला सोई। प्रेम प्रीत अंतर कछु औरै, कहा न माने कोई ॥
शब्द १३९-खाय लिये सब दुनियां देवनियां ॥ टे० ॥ घेर घेर सकलो जग खाये, घर घर सांपनियां ॥ देश देशके राजा खाये, गांव गांव भूमिनियां ॥ सरग पताल लोक सब खाये, तिहुं पुर पाटनियां ॥ जैनी जती नाथ सब खाये, शीश घुनी घुननियां ॥ स्वामी सब उपदेसित खाये, निरधन औ धननियां ॥ तीरथ भवंते भोंटू खाये, कनक औ कामनियां ॥ जोगी जंगम तपसी खाये, खाये सुनि बाधनियां ॥ शंकरके समाध छुडाये, माया मोहनियां ॥ चार बरन चारों जुग खाये, दोऊ दीन दुननियां ॥ षट् दरशन पतिबरता खाये, बीन बीन विननियां ॥ दोय एक बांच रहे हैं, राम नाम गुननियां ॥ कहैं कवीर एक सांच प्रचे, नहिं बांचे सब दुननियां ॥
शब्द १४०-बाजीगर बाजी रची, माया विस्तारा ॥ बाजीसों बाजी रमें, बाजीगर न्यारा ॥ टे० ॥ अहं बांस ममता गडो, नौ डोर पसारी। मोह ढोल बाजे सदा, नाचे नर नारी ॥ काम क्रोध हंकारका, ले डमरू बजाया। जल थलमें जिव किते, माया भरमाया ॥ दुख सुख गोता ऊचरे, माया मद पीया। ब्रह्मा विष्णु महेशको माया बस कीया ॥ चंचलते निहचल भया, अमर घर आया। कहैं कवीर बाजी तजी, बाजी गर पाया ॥
(८१६)
कवीरपंथी—
शब्द १४१—मायाके गोविंद है, गोविंदकी माया॥ माया औ गोविंदके, काहू अन्त न पाया ॥ टे० ॥ राजकुँवारी द्वारे सोहई, माया बिन नंगी । माया घर चंडालके, सोहत अति चंगी॥ जेते वेद किताब है, माया बिन फीके । जेते देवी देहरा, माया सो नीके॥ शेख सैयद सुनि जना, सब मायाके वारी । ऊपर त्यागी सब कहें, अंतरकी प्यारी ॥ आगेसे माया चली, पीछे भी माया । कहें कवीर साधू बिना, कोई अंत न पाया ॥
शब्द १४२—भज भगवंत भूल मत जावो रे॥ मानुष जन्मको एही लाभो रे॥ गुरुसेवा कर भक्ति दिढाऊं । ताते मानुष देही पाऊं॥ जो देहीको सोचे देवा । सो देही कर हरिकी सेवा॥ अब न भजो भजो कब भाई । आवे अंत तोहि भजो न जाई॥ सतगुरु मिले तो होय ततसारा । फिर पछतैहो बारंबारा ॥ जौलों काल न आसे काया । तौलों जरा मरन नहीं आया ॥ जौलों हिये परो नहीं बान । तौलों भजो नर सारंगपान ॥ एही तेरो औसर एही तेरो दाव । घटहीमे एक शब्द चेताव ॥ कहें कवीर जीत भावे हार । बहु बिध कहाँ पुकार पुकार ॥
शब्द १४३—सत गुरुदेव दया करो बिधि देहु बताई ॥ जीव ब्रह्म कैसे भयो, केहि पूछों जाई ॥ टे० ॥ सुनो संत चित लायके, यह खेल अपारा । आवत जात लखे नहीं, यह अचरज सारा॥ जा घरते जिव आइया, सो तुम्हें लखाया । पवन डोर चढ संचरे, जल सिरजी काया ॥ पूरब पश्चिम दछिन, उत्तर फिर आया । दिव्यदृष्टि पावे नहीं, घर घर भरमाया॥ दश दरवाजा प्रगट है, चार कुलफ लगाये । दोय दरवाजा ऊघरे, हंसा सञ्चु पाये॥ पांच तत्त्व एकतत भये, नौ खंड बनाया । तामे भौर बिलंबिया, नख सिख लौ लाया॥ कुंभके जल सायर मिला, जल जलहि समाया॥
शब्दावली
(८१७)
सो जल कैसे काढिये, विधि देहु बताया ॥ सतगुरु खेवट साथले, जिन अथाह थहाया । कुंभके जल कुंभे मिला जल, जलहि समाया ॥ कहें कवीर धर्मदाससों, मैं कहों पुकारा । एक नाम चीन्हे बिना, अटके जमके द्वारा ॥
शब्द १४४-तुम सब घट पूरन साईं, मेरी ओर चितवत नाहीं ॥ टेक ॥ या घटके कोई ना जाने मेहरम साईं ॥ अबकी बार चितवो नेक मोपर, जिवकी कल्पना जाई ॥ सेवा सुभिरन कछु न जानो, औगुन है गुन नाहीं ॥ हमसे पतित तुम केते उबारो, हमहुंको तरु गोसाईं ॥ अधम उधारन सुन यह बिनती, अरजी बिसर न जाई ॥ साहब कवीर अधमको तारो, तुम्हरो विरद लजाई ॥
शब्द १४५-बोलनहारा राम रजा है ॥ पिंड ब्रह्मांड रहा भरपूरी, आप अकेला बांध धजा है ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परो जल माहीं, जलहीते बुदबुद उपजा है ॥ मिट बुदबुद जल माँहि समाने, हो रहो एक सरूप सजा है ॥ जैसे कुंभ भरो जल माहीं, सबमें दरसे चंद सजा है ॥ विनसे कुंभ चंद ना विनसे, शब्द सरूपी अमर अजा है ॥ जामों हम सोई हम माँही, वाही तत्त्वमें गगन गजा है ॥ कहें कवीर संशय कछु नाहीं, तत्त्व लखा तब भस्म भजा है ॥
शब्द १४६-बैरागी रामा गांव ठाँव, खोजे सचु पाऊंगा ॥ टे० ॥ तीरथ जाऊं न जलमें पैठों, जीव जतन सत पाऊंगा ॥ सकल तीर्थ गुरु घटमें बतायो, तामें पैठ नहाऊंगा ॥ पानी ढोरों न पाहन पूजों, देव देवल नहि जाऊंगा ॥ व्रत अखंडल मंडल ऊपर, अनहद बीन बजाऊंगा ॥ बेद किताब सुमृति ना मानों, गीत कवित्त न गाऊंगा ॥ पाँच सोहंग करें नहि पूजा, भला भला न कहाऊंगा ॥
(८१८)
कवीरपंथी—
बैठ नाम निहछत्र सिगासन, अविगतसों लौ लाऊंगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सहज समाध लगाऊंगा ॥
शब्द १४७—तुम चलोतो चाल निगोडा, मैं तो गंगा न्हाऊंगी ॥ टेक ॥ इमनी बेच्छं तिमनी बेच्छं, सेर दस गेहूं लाऊंगी ॥ पांच सेरकी करों कडाई, मंजिल मंजिल पर खाऊंगी ॥ छोरा पटकूँ छोरी पटकूँ, घरमें आग लगाऊंगी ॥ सुनियोरी मोरी पारपडोसन, दिना चारमें आऊंगी ॥ गंगाजीके तीर जायके, अजपा जाप जपाऊंगी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मूंड मुंडाय घर आऊंगी ॥
शब्द १४८—कायागढ नगरियासे, गगरिया भरके लावो रे ॥ टेक ॥ पवनके इनरवासे, सुरति डोरिया लावोरे ॥ नौ नारी पनिहारी आई, लागा पूरा दावोरे ॥ पांच पचीसो रंगे चंगे, मनके माते भावो रे ॥ निरगुनके इंडरोया धारे, होले होले आवोरे ॥ गगन अटरिया चढके देखो, सबका भावो रे ॥ सदरद दिवाने खडे डुवारे, दरसे वाके पावोरे ॥ साहब कवीर गुरु भर भर लावे, संतनको पिलावोरे ॥ जन्म मरन भी संशय नहीं, ऐसा कहरा गावो रे ॥
शब्द १४९—नइया बिच नदिया डूबी जाय, कहीं देखेहो मिसरजी ॥ टे० ॥ एक अचंभा हमने देखा, कुवामें लागी आग ॥ जल हता सो जर गया, मछली न लागी आंच ॥ नदी किनारे नइया लागी, नदिया डूबी जाय ॥ ये माया भगवानकी, ताहीसे उबियाय ॥ चीटी चली सासरे, नौ मन काजर लाय ॥ हाथी मार बगलमें दावे, ऊंट लिये लटकाय ॥ एक चींटीके सुवले, खाये गिध हजार ॥ बाकी बचे सो काकरे, चील रही मड़राय ॥ एक चींटीके मूतमें, बहगये नदिया नाल ॥ पंडित पछारे धोतियाँ, धीमर डारे जाल ॥ गगन मंडिलमें गऊ वियानी, धरती दही जमाय ॥ बाछा वाके
शब्दावली
(८११)
पेटमें, माखन हाट बिकाय ॥ एक अचंभा हमने देखा, गढ़ाके सिर सींग ॥ चींटीके पग डोरी लागे, खैंचे अर्जुन भीम ॥ कहें — कबीर सुनो भाइ साधू, या पद है निरबान ॥ या पदका कोई अरथ लगावे, सोई संत सुजान ॥
शब्द १५०-बानी छोड़दे अभिमानी ॥ टे० ॥ जे भईयाके गरब करत थे, सोई भये अगवानी ॥ जे सायरके गरब करत थे, तापै सिला उतरानी ॥ जे लंकाके गरब करत थे, सोई भये धुरधानी ॥ कहे कबीर सुनो भाइ साधू, शब्द लेउ पहिचानी ॥
शब्द १५१-अवधू कौन देश निज डेरा । तेरो हंसा लेत बसेरा ॥ टे० ॥ कौन देश है कौन दिशा है, कौन आपहो साई ॥ कौन महलकी टहल करत हो, कहो खबर केहि ताई ॥ नर नारीके गरभ भोगते, सहजे काया पाई ॥ की तुम जनमें मात पितासे, की बीचहि आन समाई ॥ चित्रगुप्त जब लेखा मांगे, बहु बल रूप सँवारा ॥ गोच केबार बांध फटकारे, अगिन कुंड ले डारा ॥ मझधार नइया डोलन लागी, अजहूं खेव सबेरा ॥ कह कबीर अबकी बेर चेतो, तब मिटिहैं जम जेरा ॥
शब्द १५२-दोय दिन खेल ले यह खेला ॥ ये तो नदी नावको मेला ॥ टे० ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरे, संग न जाय तेरे घेला ॥ और जनम बहुतेरे पावौ, मानुष जन्म दुहेला ॥ मात पिता सुत कुटुम्ब कबीला, संग न जाय तेरे भेला ॥ चार वेद षट्शास्त्र पुकारें, संत न देहैं हेला ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, गतीका विरद दुहेला ॥
शब्द १५३-तुझे बोलनकी सुध नाही रे ॥ टे० ॥ चंद चढे कुल आलम देखे, मैं देखों तेरे ताई रे ॥ दुनियां पूजे पीर पैगम्बर, मैं पूजों गुरु साई रे ॥ काम क्रोध अभिमान भरो है, कालके फाँस
(८२०)
कवीरपंथी—
पराई रे ॥ नारिको यार माते मदिरासे, विके बिराने हाथाई रे ॥ जो तनका तूं गर्ब करत है, सो तन नहीं रहाई रे ॥ अजहूं चेत सुगध नर मूरख, सतगुरु होय सहाई रे ॥ अरे मतिमंद जनमके अंधा, किन ऐसी मति दहाई रे ॥ कहैं कवीर अबकी बेर चेतो, योही न जन्म गवाई रे ॥
शब्द १५४—क्या लड़ना बिराने भागोंसे ॥ टे० ॥ एक जु खाते दूध बतासे, एक गुजारे सागोंसे ॥ एक जु चढ़ते हाथी घोडा, एक लगे वाके बागोंसे ॥ एक जु पहिरे मखमल खासा, एक गुजारे आगोंसे ॥ जो लिखनी बिघने लिख दीन्हा, सो न टरे वाके भागोंसे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु चरन दीदारौसे ॥
शब्द १५५—मायाका गुलाम गेदी क्या जाने बंदगी ॥ टे० ॥ साधुसे धूमधाम, चोरनसे करे काम । धीगनसे हाथ जोरे, कपटकी बंदगी ॥ कपटके माला लीन्हे, पाखंड तिलक दीन्हे । आधारंगी धोती पहिरे, करत मिजाजगी ॥ होद न सके बंदगी, किया चाहे सिद्धगी । कहैं कवीर धिक्कार ऐसी जिदगी ॥
शब्द १५६—गाफिला साईका नाम विसारा ॥ टे० ॥ पानीके बुंदसे पिंड प्रगट भये, ऐसा सिरजनहारा ॥ नीचे शिर ऊपर पग तेरा, जब तूं किया पुकारा ॥ नौ दस मास गर्भ प्रतिपाले, वहां तोहि दिया अहारा ॥ जठर अगिनमें राख लियो है, ऐसा राखन- हारा ॥ कौल बोलके बाहिर आये, यहां भये वटपारा ॥ कहैं कवीर समुझ नर अंधा, कौलको करो संभारा ॥
शब्द १५७—दोय दिन पडाव हैदा भाई ॥ टे० ॥ हिंदू श्रवर घेरके मारे, मुसलमान काटे गार्ई ॥ घड पखानके सुरत बनाये, ता पूजन दुनिया धार्ई ॥ सुरदा गाड मसीत बनाये, तासों पीर कहे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, विन समुझे परलैं जाई ॥
शब्दावली
(८२१)
शब्द १५८-सोवें मन मेरा जगे न जगायेसों॥ आलस अमलरस मदरस पायेसों॥ टे०॥ ऐसो पापी मन पंचो, ठग न ठगायेसों॥ गुरुमुख बात न सुने सुनायेसों॥ आगे बात न वनिहै बनायेसों॥ गुरुउपदेश न सुने सुनायेसों॥ फिर नहिं बात आगे वनिहै बनायेसों॥ छूछी भरी गगरी करम ढरकायेसों॥ का सोया बहुत न सुने गोहरायेसों॥ कहें कवीर सुन या जग आयेसों॥ अमृत छोड़ विपैरस पायेसों॥
शब्द १५९-येरे सतगुरु गह लई बांह, नहीं तो मैं बहे जाती॥ टे०॥ जग झूठा बदनाम है, मन ज्ञानी अभिमान। सतगुरु बोली बोलिया, जासे झनक पुरी मेरे कान॥ बारू नग पैदा किया, धन कारीगर तोहि। सिकलीगर सतगुरु मिले, दरस दिखावो मोहि॥ माया मार ममता तजे, शब्द सनेही होय। लोभ लालच ये सब तजे, सतगुरु परसे सोय॥ काम क्रोध जो त्याग है, तिन घट ब्रह्म समय। कहें कवीर ते बांचहीं, ना तो जमपुर जाय॥
शब्द १६०-कित गया रे पंछी बोलता॥ टे०॥ अन भी खाता पंछी पानी भी पीता, उड तरवर पर बैठता। सेत सुपेती नरम गेंदरा, तापर पंछी पौढता॥ लटपट पाग बांधे मूछ सँवारे, ले दृपन सुख देखता। कहें कवीर सुनो भाई साथो, रती रती कर भेजता॥
शब्द १६१-साईके चरण चित लाव मना॥ टे०॥ उदर भरनके कारणे, सुरही वनको जाहिं। त्रिन चरे चहुँ दिस फिरे, वाके सुरत बछरुवा माहिं॥ पांच सात सहेलरी, हिलमिल पनियां जाहिं। दै तारी सुख वे इंसी, वाके सुरत गगरिया माहिं॥ नटनी नाचे चौहटे, लोग करत हैं शोर। सुरति बांध चढी बांससे, वाके चित्त डगे कहुँ और॥ ज्वारी राचे जुवामें, कामी राचे काम। कहें कवीर धर्मदाससों, तुम या विध सुमरो नाम॥
(८२२)
कबीरपंथी-
शब्द १६२-हमारे पिया मिले ब्रह्मज्ञानी॥ टे० ॥ काग बरनते हंसा कीन्हे, दीन्हा शब्द निशानी ॥ सुंदर रूप सोहावन मूरत, पूरन है ब्रह्मज्ञानी ॥ सेज सँवारो गुरुज्ञानकी, सुरति निरतिसे आनी ॥ कुमत जराय कियो हम काजर, प्रेम प्रीतसों आनी ॥ शील संतोष पहिर दोय कंकन, होरही मगन दिवानी ॥ इतना सिंगार कियो जब बिरहिन, तब पियाके मन मानी ॥ ऐसे पिया मोहि कबहुं न मिलिया, देख सुरत ललचानी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधू, तनकी तपन बुझानी ॥
शब्द १६३-तोहे बान पर गई देखनकी, दो नैननके बीचमें ॥ टे० ॥ ररा मम्मा अच्छर दोई, भूल गई सुध लेखनकी ॥ बहदा खूब दोई घट साहब, जान परें कोई भेषनकी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, संत निशानी टेकनकी ॥
शब्द १६४-सतनाम हीरा सार, हिरदे लगाय राखो रे ॥ टे० ॥ मनकी रे मनोरथ माला, मनको पहिरावो रे ॥ कपटके कँडुला उतार डारो रे ॥ मनकारे मनोरथ धोबी, मनको नहि धोया रे ॥ दिलके दगवा, छुटाय डारो रे ॥ प्रेम प्रीतके बिरछा, ले अमृत सीचोरे, बिषके बेली उपार डारो रे ॥ कबीर अपने तनमें, दिल अंदर खोजो रे, मूरतसे मूरत मिलाय राखो रे ॥
शब्द १६५-छाड़ो मन मेरा जगतके खटका ॥ टे० ॥ बैद तो बैदाई करे, नारी मन अटका ॥ पिंजरासे सुवटा कौन बिधि सटका ॥ पंडित तो पंडिताई करें, पोथी मन अटका ॥ औरनको राह बतावे, आप खाय भटका ॥ गुनियां मांगे पान फूल, देवी मांगे झिटका ॥ कितना माँगे और और, आवत काल कोई ना हटका ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, काल कला घर आवत नटका ॥
शब्द १६६-बाबा साईजी ए तो ख्याल तुम्हारा ॥ टेक ॥
शब्दावली
(८२३)
असमानी एक बाज उड़ा है, कडवा तीर चलावे ॥ जद बकरीने बाघ पछारा, उसको कौन छुडावे ॥ चहाने तो विछी पकरी, सुरगा घर घर रोवे ॥ बंदरके घर धूम मची है, ऊंट विसुन पद गावे ॥ गूंगा कहे बधिरसों बातों, अंधा पुरान बांचे ॥ जद ठूँटा मुदंग बजावे, लंगडा क्या खूब नाचे ॥ कहें कवीर यह उलटा पद है, बिरला जाने ज्ञानी ॥ सतगुरु घरका पूरा होई, सो यह बात पिछानी ॥
शब्द १६७-संतो अचरज एक मोहि लागे ॥ कुलकी रीत सदा उर धारे, सत्यशब्दसो भागे ॥ टे० ॥ कुलकी रीति भगति ना होई, ये सब बिषै व्योहारा ॥ मन मायासो अटके प्रानी, सूझे वार न पारा ॥ औरनसों कहें त्यागों भाई, आप सर्वस लपटाने ॥ जो लग जोग जुगत ना आवे, सकल काल घर जाने ॥ बांस बड़ाई छांडत नाहीं, ढिग चंदनके बासा ॥ आप तजे न बांस बड़ाई, ताते गयो निरासा ॥ जोपै लोक हमारा चाहो, धर्मनि तजो बड़ाई ॥ सतगुरु शब्द खोजके देखो, करम भरम छेजाई ॥ कहें कवीर मैं कहों पुकारी, सुनो संत निज बैना ॥ जब लग कुलकी रीत न छूटे, तब लग फूटे नैना ॥
शब्द १६८-कितने दिननके ठानो ठाठ ॥ टे० ॥ जो देहिया तुम निशदिन पालो, सो देहिया मिले माटी माट ॥ परनपखेर नगर एक काया, ना जानो जाये कोने बाट ॥ मर मर जैहो फिर फिर ऐहो, सौदा कर सतगुरुके हाट ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अब का करिहो कागद फाट ॥
शब्द १६९-माली सींचता फुलवारी ॥ टे० ॥ ऊपर माली घर किया है, नीचे राखी द्वारी ॥ पानीसे जिन पिंड रचा है, ऐसा
(८२४)
कवीरपंथी—
अविगत प्याली॥ नौका बैठे रहट चलावे, सौंचत काया बारी॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, सतगुरुकी बलिहारी ॥
शब्द १७०—लग्गी न छूटे चाहे जिय जाय॥टे०॥ सारके भाले सार रहे, गुरु ज्ञान कमान चढाई॥ सतगुरु केवल वहियां, कोई अंदर भाल रमाई ॥ ध्रुव लागी प्रहलादे लागी, लागी विभीषन राई ॥ बिप्र सुदामाको ऐसी लागी, कंचन पुरी बसाई ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी लागी, मीरा बाई ॥ पीपाजूको ऐसी लागी। कूद परा दह मांही॥ रंका लागी बंका लागी, लागी सदन कसाई॥ साह बलखको ऐसी लागी छाड़ चला बदसाई ॥ शेख फरीद कुवा बिच लटके, कागा चुन चुन खाई॥ वाजिंदाको ऐसी लागी; दौलत सबै लुटाई ॥ पैडेमें एक घायल पडा, वाके घाव नजर नहि आई ॥ पाव पलककी खबर न जाने, गहरी नीव दिवाई ॥ भौसागरमें नाव परी है, पार लगावो साई ॥ कहे कवीर दया सतगुरु बिन, कायर बूडा जाई ॥
शब्द १७१—हीरा जनम न बारम्बार, समुझ मन चेत करो॥टे०॥ पूरन परमानंद किया सब ताका होई। जब तब राखनहार, तरन तारन है सोई॥ संग आवै संग जायगे, अजहू संग रहाय। संग तुमारा छोड़के, अंत न कतहुं जाय॥ ठहर अगिनकी आंख तहां, प्रभु सिरजे अंगा। तहवां रच्छा करी आप, तुम्हारे होय संग॥ एक बुंदके साजमें, ऐसा किया बनाव। सरवन नैन मुख नाशिका, छबि दिये चलनको पांव ॥ कीट पतंग पखान भये, तरवर पशु पंछी। जलतरंग शिव भये, भये मगरा औ मछी ॥ अंग उघारे ते फिर, कतहुं न पावे सुकर। एक नाम जाने बिना, जनम जनम बहु दुकर ॥ बूडे दुख बिहाल जबे, औंचे सुख झूले। सो दिन बेग सँभार, कहैवा जाते अब भूले॥ मन भ्रमताके कारने, कीन्है
शब्दावली
(८२५)
नरक निवास । सुगंध रूप हो रहे, तब जीव गरभ दस मास ॥ इन दुखनसे काढ़ि, प्रगट बाहेर प्रभु कीन्हा । भगति अंगकी छांप प्रभू, दस्कत लिख दीन्हा ॥ उनको नाम न ले सके, जिन पठये भव मांह । रंचक सुखके कारने, विसर गये निज नाह ॥ बालक बुध अजान, कहा कछु मर्म न जाने । खेले सहज सुभाव, जहाँ वाके मन माने ॥ अधिक हठीले हो रहे, ना काहूको मान । भला बुरा चित ना धरे, बारा बरस अजान ॥ नौ दस भीतर आय जान, जब जुरी सगाई । नारीते पहिचान, नाम बद कीन्हे भाई ॥ पुरुष नाम ना ले सके, जिन पठये भौ माहिं । येहुं उमर भूले फिरे, देख कुटुम्बकी बांह ॥ जोवन जोर झकोर, मसी जब मुखपर आई । अंग सुगंध लगाय, शीश पगिया ढरकाई ॥ अंध भये सूझे नहीं, फूट गये जो चार । झूठे काम पंतंग जो, देख बिरानी नार ॥ जैसे रंग कुसुम, बहुत दीखतके नीके । भावे दिन दस चार, अंत लागेंगे फीके ॥ माया निकट बुलायके, देवै छाती बाढ । लीन्हे रंग निचोयके, ज्यों कोल्हू तिल काढ ॥ नाम जो रंग मजीठ लगे, छूटे ना भाई । रचे रच रहे शरीर, सबे दिन दिन अधिकई ॥ बारम्बार धोवाइये, देव करारी धोय । ज्यों ज्यों फटे पिछोरा, दिन दिन ऊजल होय ॥ जोधा अजर अजीत, पलट पुहमी पग धरते । दुश्मन रहत डराय जाहि छल बल कर गहते ॥ सौ जोजन मरजाद है, सिंधु करत एक फाल । हाथन परबत तौलते, तो धरि खायो काल ॥ जिन बांधा बलबीर, देव तेतीस करोरी । तिनके बिगरे राज, जरत जस फागुन होरी ॥ देखो दिष्टि पसारके, नर तुम्हरे केतिक बात । देखतही तुम जावगे, ज्यों तरवरके पात ॥ सोवतहौ केहि नींद, सूठ मुरख अज्ञानी । अंत समय पछताव, हंस जब देय पयानी ॥ काहे खोटी करत हो,
(८२६)
कवीरपंथी-
तुम्हारा बड़ा अभाग । लेखा मांगे वह धनी, तब का देहु जबाब॥ झीनी भाषा बोल, चेत चित कामिन चोरी । छिन छिन प्रीत बढाय, नामसे नाता तोरी ॥ लीन्हे अंग संग करी, रही ठगोरी मेल । या विध भंवर विलंबिया, कैवल रहे मुख फेर ॥ माया खोटी हाट, समुझके सौदा कीजे । खोटा खरा बिचार, परख अपने दिल लीजे ॥ तुम जिन खोवौ बावरे, हरि हीराकी सांट । कितने नर डहका गये, इन साहुनके हाट ॥ जोबन जोर झकोर, नहीं उर अंतर बाड़ी । होहु संत हुशियार, परख निज बांधो गाढी ॥ दे गजगीरा प्रेमको, मूदो दसों हुवार । वहि साहबके मिलनको, पलक न लागे बार ॥ सोवत हो केहि नौद, मूठ मूरख अभिमानी । भोर भये पछताव, हंस जब देह सिरानी ॥ छूटत है यह अंगते, ज्यों सरवरके वार । अब मैं सांची कहत हों, उडिहो पंख पसार ॥ ना जाने केह हेत, भये मानुष तन येहा । मन बच करम बिचार, जान निज चेतो देहा ॥ लख चौरासी भरमके, पाये मानुष देह । सो तन पाय न खोइये, झूठे प्रेम सनेह ॥ बिदा भये पछताव, जबें तीनों पन हारो । समुझ पुरानी प्रीत, बोल लागे तब प्यारो ॥ लचक धनुहियां जब गई, केस भये सब श्वेत । बोल बचन आवे नहीं, लूटे लियो घर प्रेत ॥ नांव झांझरी लाद, साज बैठे बैपारी । बोझे लोह पखान, मोहिं डर लागत भारी ॥ मांझधार पर भँवरमा, आन परी तब भीर । एक नाम जाने बिना, को गहिलावे तीर ॥ सौ भइयाके बाँह तपे, दुजौधन राना । परे नरायन बीच, भूमिमें विग्रह ठाना ॥ युद्ध रचा कुश्लेत्रमें, वानन बरसे मेह । तिनहुंके अभिमान गा, गीध न खाई देह ॥ छत्रपती महिपाल रहत, देखा नहीं कोई । दिन दस गये बजाय, अंत गरदहु मिल सोई ॥ परिहो नर्क अघोरमें,