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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८११)

भस्व रहतो ॥ राजा नल ऐसे होते, नित सहस गळ देतो ॥ कज- रीबनके कुंजर कीन्हे, हरी डार चरतो ॥ राजा हरिचंद सतवादी, नित सत्यहिसे रहतो ॥ ढोये नीर नीच घरहीको, भये मरघटके मँगतो ॥ दस मस्तक बीस भुज वर रावन, रात दिवस बकतो ॥ छिन्मै मार पछारिया, गये लंकासे रीतो ॥ राजा बलि ऐसे होते, नित सहस जह्न करतो ॥ ताहि पताल पठाइया, जहां शेशनाग रहतो ॥ अजामेल ऐसे होते, नित गनका संग करतो ॥ ताहि बैकुंठ पठाईया, ऐसी उलटी रीत करतो ॥ पांडवसुत ऐसे होते, नित छपन भोग करतो ॥ ताहि मार पठाइया, ऐसे प्रीत तोर बिचरतो ॥ जिन खोजा तिन पाईया, कोई साधूजन लहतो ॥ संतन सदा समीप बसत है, गावै जन कवीर भगतो ॥

शब्द १२७-संतो कोई जन शब्द बिचारा ॥ शब्द भेद आद सतगुरुका, परखलेव टकसारा ॥ १० ॥ शब्दै सुन सुन भेष धरत है, शब्द कहे अनुरागी ॥ षट्दर्शन सब शब्द कहत है, शब्दै कहै बैरागी ॥ शब्दै वेद पुरान कहत है, शब्दै शब्द ठहरावे ॥ शब्दै सुनिवर साथ कहत है, भेद न कोई पावे ॥ शब्दै येही जग उपजाया, शब्दै केर पसारा ॥ कहैं कवीर जहांते शब्द उपजो, ताका भेद नियारा ॥

शब्द १२८-संतो जिन जाना तिन माना ॥ शब्दहि चाल चले कोई बिरला, कथनी कथ लपटाना ॥ १० ॥ शब्द निराधार जीव आधारी, कहु कैसे रहि जाई । बीचहि अटक रहै बैपारी, भेंट सबनकी खाई ॥ रहे सरगुनमें कहैं निरगुनकी, दुनियाभाव न जाई । निरगुन सरगुन दोउ पछ भारी, फिर माया लपटाई ॥ ईद्री भोग आपनी जाने, दोजकसों मन माना । कहैं कवीर जिभ्याके लंपट, माया हाथ बिकाना ॥