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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 824

(८१०)

कवीरपंथी—

बडा अंदेशा ॥ निरगुन कहिये नाम महातम, सरगुन संत विराजे । गुन बिन निरगुन हाथ न आवे, औगुन देखे भाजे ॥ निरगुन सरगुन एक रूप है, बिरला जन पद परसे । हंस शब्द एक चित होवे, अमी सुधारस बरसे ॥ कहैं कवीर अंतरकी करनी, परगट होय तब सांची । अपने पति केर पतिबरता, गगन मगन होय नाची ॥

शब्द १२४—सो तो अबिगत अगम अपार, पार कस पावै ॥ टे० ॥ जा खोजत ब्रह्मादि भुलाने, तिनहुँ न पाये भेव । जा खोजत शिव मगन भये, शनकादिक शुकदेव ॥ सतखुगमें सतबरता, द्वापर पूजा पान । त्रेता होम जह्र व्रतसंजम, कलखुग केवल नाम ॥ सेस सहसमुखुख निस दिन गावे, अस्तुत करे सुरार । ऋग् यजु साम अथर्वन थाके, कर न सके निरवार ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, दिगंबर दरवेस । चुंडित मुंडित और जटाघर, ये उरझे बहु भेश ॥ तीरथ गये ते एही महातम, तब कोई पूजे पानी । एको सुमत हाथ नहिं आवै, कर गय मुनिजन ज्ञानी ॥ धरती अगिन पवन औ पानी, भिन्न भिन्न विस्तारा । आवे न जाय मरे न जीवे, सबते रहत निनारा ॥ जो कहिये सबहीमें साहब, मौत कहांते होई । कहैं कवीर तिनके जिव डोलै, पिंड प्रान बिन सोई ॥

शब्द १२५—हैरे अडोला कहिं डोलत नाही ॥ गगनमें चंदा जलबिच झाई, मीन गहे मुख आवत नाही ॥ टे० ॥ चंदन काठ सुख जो जाही । ताकी बास ताहीमें रहाही ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी । तन नहिं खोजत खोजत मूरी ॥ कहैं कवीर मन मिलिया होई । शब्द सुरतमें राख समोई ॥

शब्द १२६—कोई जन जानेगाहो अबिगत नाथ मतो ॥ भंजन घडन सँवारन आपे, अलखपुरुष रहतो ॥ टे० ॥ ईददवन ऐसेहोते, नित घृते होम करतो ॥ अजगर कीन्हे कूपजलको, पवन भखी