कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 823, कुल 968 में से
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सत्य तुम चीन्हों, सत धोख न कहाई। सत्सरूप जबे तुम पावो, यह सत चित्त न आई॥ मैं तो तुमरे भले कहत हों, सत्य सरूप विचारो। कहें कवीर वह सत् समुझके, आवागवन निवारो ॥
शब्द १२१-देखो अलख पुरुषकी करनी, बड़े बड़े धरा बिगूचे ॥ टे० ॥ हरचंद चले मिहरी बेचनको, पूतहि खायो सांपा ॥ वाकी अम्मा जरावन लागी, जरन न देतो बापा ॥ दशरथके दोय पुगरा कहिये, औरत सो चित दीन्हा ॥ बडा वियोग भया रघुपतिको, रावन गा सिर छीना ॥ सोरा सहस आठ पटरानी, एते कान्हर आनी ॥ बड़े उजीर हते पाठनमें, तिनहूँकी दुरम लुटानी ॥ पांचो पांडव छठी द्रौपदी, और बिगूचे केता ॥ लैके हाड हिमारे गारे, जन कवीर जग जीता ॥
शब्द १२२-धर्म सुत काहे न देख बिचारी। सत् बोलते राज तुम्हारे दीन्हों देश निकारी ॥ टे० ॥ पांच पूत कुंतीके कहिये, एकोतरसौ गंधारी। एकै बुंद पिताके होते, काहेको मांडी रारी ॥ ब्रह्मज्ञान अरजुन तब चीन्हें, धनुष बान दिये डारी। छल प्रपंच कृष्ण एक कीन्है, दीन्हा बदन पसारी ॥ पांच भइयाकी एकै नारी, सबही संग सुख कीन्हा। जीवदान भीम तब मांगे, कृष्ण सहित आधीना ॥ भारथ भरीके अंडा राखे, तुम कुरुक्षेत्र कराये। गोत्रघाव दाव नहीं जानो, ताते हिमाल पठाये ॥ कुंजल एक हतो रन भीतर, तुमसो झूठ बोलावे। नरकबास दिखलावे तोही, जब सुरपुरहि पठावे ॥ सोई सत् दो परदी कहिये, जाकी भक्ति तुम ठानी। कहें कवीर सुनो हो पांडव, हिरदै करो बिलछानी ॥
शब्द १२३-संतो परी अरुझन भारी। कहे सुने कछु हाथ न आवे, अविगतकी गत न्यारी ॥ टे० ॥ कोई कहे हम निरगुन सेवै, निरगुनका गुन कैसा। को निरगुन को सरगुन कहिये, एही