कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
विलैमान हो जाहु छिनकमें, याहू ठौर बिन होइ हो ॥ बारंबार विचार सोच जिय, अपने माहिं समैहो। कहैं कवीर मुक्ति नहि आगे, ज्योंका त्यों ठहरैहो ॥
शब्द ११८—नर तुम कियों न एकौ काजा। काम कोध तृष्णाके बांधे, लूटत है जमराजा ॥ ८० ॥ बनखंड जाय जोग तप कीन्हा, कंदमूल फल खाया। होते ज्ञानी परम सुख ध्यानी, पाती काह लिखाया ॥ चार वेद तुम हित के राखे, फीकी उनकी आशा। काल भच्छ सब दुनियां सिरानी, इन्हीके विस्वासा ॥ प्रेम भगति हिरदे ना आवे, नाच काछ मन दीन्हा। राग रागिनी डिंभ धरीधर, तिन हरसों का लीन्हा ॥ फिरै काल अनंत लोकमें, मध्य लखे मुनि ज्ञानी। कहैं कवीर ते भये खालसे, रामभक्ति दिद जानी ॥
शब्द ११९—नर तुम झूठे जनम गवाईया। उस झूठेका कोई अंत न पाया ॥ ८० ॥ झूठेके घर झूठा आया, झूठे ते परचाया। झूठी थारी झूठा भोजन, झूठे ले सब खाया ॥ झूठेके घर झूठा आया झूठे व्याह रचाया। झूठा दूलह झूठी दुलहिन, झूठे व्याहन आया ॥ झूठे नर सब झूठी नारी, झूठे बालक जाया। झूठी छाती झूठी कोखी, झूठी दूध पियाया ॥ सांच कहुँ मैं झूठ न बोल्हूँ, सांचेको झूठाया। कहैं कवीर सोई जन साँचा, अपने माहिं समाया ॥
शब्द १२०—सुन राजा हरचंद भुवनके, सत्त तुम ठानी। विप्र एक काल होय प्रगटो, तुमहुँ असत्त न छानी ॥ ८० ॥ पतनी सहित राज तुम दीन्हा, हाटो हाट बिकानी। जो यह सत्त भली पुन होती, करत नहीं कुल हानी ॥ जेहि कारन तुम नीच डोम घर, भरलाये घट पानी। बसहीके तुम चीर छोडाये, उलटी मत तुम ठानी ॥ अगम अगोचर मूल ब्रह्मको, सो तुम कितहु न पाई। सत्यकर तुम नीच बुध घर, फिर फिर जोनी आई ॥ भरम छांड