कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
शब्द १६२-हमारे पिया मिले ब्रह्मज्ञानी॥ टे० ॥ काग बरनते हंसा कीन्हे, दीन्हा शब्द निशानी ॥ सुंदर रूप सोहावन मूरत, पूरन है ब्रह्मज्ञानी ॥ सेज सँवारो गुरुज्ञानकी, सुरति निरतिसे आनी ॥ कुमत जराय कियो हम काजर, प्रेम प्रीतसों आनी ॥ शील संतोष पहिर दोय कंकन, होरही मगन दिवानी ॥ इतना सिंगार कियो जब बिरहिन, तब पियाके मन मानी ॥ ऐसे पिया मोहि कबहुं न मिलिया, देख सुरत ललचानी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधू, तनकी तपन बुझानी ॥
शब्द १६३-तोहे बान पर गई देखनकी, दो नैननके बीचमें ॥ टे० ॥ ररा मम्मा अच्छर दोई, भूल गई सुध लेखनकी ॥ बहदा खूब दोई घट साहब, जान परें कोई भेषनकी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, संत निशानी टेकनकी ॥
शब्द १६४-सतनाम हीरा सार, हिरदे लगाय राखो रे ॥ टे० ॥ मनकी रे मनोरथ माला, मनको पहिरावो रे ॥ कपटके कँडुला उतार डारो रे ॥ मनकारे मनोरथ धोबी, मनको नहि धोया रे ॥ दिलके दगवा, छुटाय डारो रे ॥ प्रेम प्रीतके बिरछा, ले अमृत सीचोरे, बिषके बेली उपार डारो रे ॥ कबीर अपने तनमें, दिल अंदर खोजो रे, मूरतसे मूरत मिलाय राखो रे ॥
शब्द १६५-छाड़ो मन मेरा जगतके खटका ॥ टे० ॥ बैद तो बैदाई करे, नारी मन अटका ॥ पिंजरासे सुवटा कौन बिधि सटका ॥ पंडित तो पंडिताई करें, पोथी मन अटका ॥ औरनको राह बतावे, आप खाय भटका ॥ गुनियां मांगे पान फूल, देवी मांगे झिटका ॥ कितना माँगे और और, आवत काल कोई ना हटका ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, काल कला घर आवत नटका ॥
शब्द १६६-बाबा साईजी ए तो ख्याल तुम्हारा ॥ टेक ॥