कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(८२१)
शब्द १५८-सोवें मन मेरा जगे न जगायेसों॥ आलस अमलरस मदरस पायेसों॥ टे०॥ ऐसो पापी मन पंचो, ठग न ठगायेसों॥ गुरुमुख बात न सुने सुनायेसों॥ आगे बात न वनिहै बनायेसों॥ गुरुउपदेश न सुने सुनायेसों॥ फिर नहिं बात आगे वनिहै बनायेसों॥ छूछी भरी गगरी करम ढरकायेसों॥ का सोया बहुत न सुने गोहरायेसों॥ कहें कवीर सुन या जग आयेसों॥ अमृत छोड़ विपैरस पायेसों॥
शब्द १५९-येरे सतगुरु गह लई बांह, नहीं तो मैं बहे जाती॥ टे०॥ जग झूठा बदनाम है, मन ज्ञानी अभिमान। सतगुरु बोली बोलिया, जासे झनक पुरी मेरे कान॥ बारू नग पैदा किया, धन कारीगर तोहि। सिकलीगर सतगुरु मिले, दरस दिखावो मोहि॥ माया मार ममता तजे, शब्द सनेही होय। लोभ लालच ये सब तजे, सतगुरु परसे सोय॥ काम क्रोध जो त्याग है, तिन घट ब्रह्म समय। कहें कवीर ते बांचहीं, ना तो जमपुर जाय॥
शब्द १६०-कित गया रे पंछी बोलता॥ टे०॥ अन भी खाता पंछी पानी भी पीता, उड तरवर पर बैठता। सेत सुपेती नरम गेंदरा, तापर पंछी पौढता॥ लटपट पाग बांधे मूछ सँवारे, ले दृपन सुख देखता। कहें कवीर सुनो भाई साथो, रती रती कर भेजता॥
शब्द १६१-साईके चरण चित लाव मना॥ टे०॥ उदर भरनके कारणे, सुरही वनको जाहिं। त्रिन चरे चहुँ दिस फिरे, वाके सुरत बछरुवा माहिं॥ पांच सात सहेलरी, हिलमिल पनियां जाहिं। दै तारी सुख वे इंसी, वाके सुरत गगरिया माहिं॥ नटनी नाचे चौहटे, लोग करत हैं शोर। सुरति बांध चढी बांससे, वाके चित्त डगे कहुँ और॥ ज्वारी राचे जुवामें, कामी राचे काम। कहें कवीर धर्मदाससों, तुम या विध सुमरो नाम॥