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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८२३)

असमानी एक बाज उड़ा है, कडवा तीर चलावे ॥ जद बकरीने बाघ पछारा, उसको कौन छुडावे ॥ चहाने तो विछी पकरी, सुरगा घर घर रोवे ॥ बंदरके घर धूम मची है, ऊंट विसुन पद गावे ॥ गूंगा कहे बधिरसों बातों, अंधा पुरान बांचे ॥ जद ठूँटा मुदंग बजावे, लंगडा क्या खूब नाचे ॥ कहें कवीर यह उलटा पद है, बिरला जाने ज्ञानी ॥ सतगुरु घरका पूरा होई, सो यह बात पिछानी ॥

शब्द १६७-संतो अचरज एक मोहि लागे ॥ कुलकी रीत सदा उर धारे, सत्यशब्दसो भागे ॥ टे० ॥ कुलकी रीति भगति ना होई, ये सब बिषै व्योहारा ॥ मन मायासो अटके प्रानी, सूझे वार न पारा ॥ औरनसों कहें त्यागों भाई, आप सर्वस लपटाने ॥ जो लग जोग जुगत ना आवे, सकल काल घर जाने ॥ बांस बड़ाई छांडत नाहीं, ढिग चंदनके बासा ॥ आप तजे न बांस बड़ाई, ताते गयो निरासा ॥ जोपै लोक हमारा चाहो, धर्मनि तजो बड़ाई ॥ सतगुरु शब्द खोजके देखो, करम भरम छेजाई ॥ कहें कवीर मैं कहों पुकारी, सुनो संत निज बैना ॥ जब लग कुलकी रीत न छूटे, तब लग फूटे नैना ॥

शब्द १६८-कितने दिननके ठानो ठाठ ॥ टे० ॥ जो देहिया तुम निशदिन पालो, सो देहिया मिले माटी माट ॥ परनपखेर नगर एक काया, ना जानो जाये कोने बाट ॥ मर मर जैहो फिर फिर ऐहो, सौदा कर सतगुरुके हाट ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अब का करिहो कागद फाट ॥

शब्द १६९-माली सींचता फुलवारी ॥ टे० ॥ ऊपर माली घर किया है, नीचे राखी द्वारी ॥ पानीसे जिन पिंड रचा है, ऐसा