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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 840

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कवीरपंथी-

तुम्हारा बड़ा अभाग । लेखा मांगे वह धनी, तब का देहु जबाब॥ झीनी भाषा बोल, चेत चित कामिन चोरी । छिन छिन प्रीत बढाय, नामसे नाता तोरी ॥ लीन्हे अंग संग करी, रही ठगोरी मेल । या विध भंवर विलंबिया, कैवल रहे मुख फेर ॥ माया खोटी हाट, समुझके सौदा कीजे । खोटा खरा बिचार, परख अपने दिल लीजे ॥ तुम जिन खोवौ बावरे, हरि हीराकी सांट । कितने नर डहका गये, इन साहुनके हाट ॥ जोबन जोर झकोर, नहीं उर अंतर बाड़ी । होहु संत हुशियार, परख निज बांधो गाढी ॥ दे गजगीरा प्रेमको, मूदो दसों हुवार । वहि साहबके मिलनको, पलक न लागे बार ॥ सोवत हो केहि नौद, मूठ मूरख अभिमानी । भोर भये पछताव, हंस जब देह सिरानी ॥ छूटत है यह अंगते, ज्यों सरवरके वार । अब मैं सांची कहत हों, उडिहो पंख पसार ॥ ना जाने केह हेत, भये मानुष तन येहा । मन बच करम बिचार, जान निज चेतो देहा ॥ लख चौरासी भरमके, पाये मानुष देह । सो तन पाय न खोइये, झूठे प्रेम सनेह ॥ बिदा भये पछताव, जबें तीनों पन हारो । समुझ पुरानी प्रीत, बोल लागे तब प्यारो ॥ लचक धनुहियां जब गई, केस भये सब श्वेत । बोल बचन आवे नहीं, लूटे लियो घर प्रेत ॥ नांव झांझरी लाद, साज बैठे बैपारी । बोझे लोह पखान, मोहिं डर लागत भारी ॥ मांझधार पर भँवरमा, आन परी तब भीर । एक नाम जाने बिना, को गहिलावे तीर ॥ सौ भइयाके बाँह तपे, दुजौधन राना । परे नरायन बीच, भूमिमें विग्रह ठाना ॥ युद्ध रचा कुश्लेत्रमें, वानन बरसे मेह । तिनहुंके अभिमान गा, गीध न खाई देह ॥ छत्रपती महिपाल रहत, देखा नहीं कोई । दिन दस गये बजाय, अंत गरदहु मिल सोई ॥ परिहो नर्क अघोरमें,